(एक) आंख क पानी राजनीति म जात मरि जात है। (दो) का कहै यार ओरहन सुनके दुखै कपार। (तीन) फुटै करम देस मा बोवै धान रोबैं किसान। (चार) ए सरकार कैसे कौर घोटाई मंहगाई म। (पांच) चतुरी चच्चा खेते- खेते कमाए अंबानी खाए। (छ:) सभै बीस हैं केहू ना ओनइस निपोरै खीस। (सात) खुबै लुटाए जे आवै लूटै खाए लोकतंत्र म। (आ…

हाइगा कार्यशाला में रचनाकारों ने बिखेरे प्रकृति के रंग

भारत ऋतुओं का देश है, जहां प्रकृति का वैविध्यपूर्ण सौंदर्य बिखरा पड़ा है। यही कारण है, कि फूलों का देश जापान को छोड़कर आने की दु: खद स्मृति हाइकु काव्य को कभी अक्रांत नहीं कर पाई। वह इस देश को भी अपने घर की मानिंद महसूस करती रही। यही कारण है कि हिन्दी साहित्य जगत के समस्त हाइकु प्रेमी और हाइकु सेव…
मजदूर दिवस पर मजदूर को समर्पित हाइगा

"हाइकु-गंगा" व्हाट्स एप ग्रुप द्वारा 'श्रमिक दिवस' पर आयोजित विशेष हाइगा कार्यशाला से लिये गये कतिपय हाइगा - - - कल्पना दुबे। अंजु निगम …
डॉ. मिथिलेश दीक्षित के हाइकु : बेटियां

यादों का गाँव रुनझुन पायल कोमल पाँव ! * क्यों री तितली तेरी रंगीन फ्राक किसने सिली? * सूरज राजा नानी को ठण्ड लगे जल्दी से आ जा ! * अब सो लूँ माँ दिन भर पढ़ना कब खेलूँ माँ ! * पायी पायल पैर पटक कर आयी 'पायल ' । * नन्हकी गाती ठुमक-ठुमक के नाच दिखाती ! * लुभा रही है पहन पैंजनियाँ नन्हीं मुनियाँ ! * ध…
न्यूजीलैंड में सराही गयी कुसुम वर्मा की मिश्रित कला प्रदर्शिनी और नृत्य

ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) । विगत 23 दिसंबर 2016 से 01 जनवरी 2017 के बीच न्यूजीलैंड के ऑकलैंड, हेमिल्टन, रोटोरूआ आदि शहरों में आयोजित सातवें अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर्स सम्मेलन में फिजी के शिक्षा मंत्रालय के हिन्दी प्रतिनिधि श्री रमेश चन्द्र, बिहार विधानसभा के अध्यक्ष श्री विजय कुमार चौधरी, न्यूजीलैंड नेशनल प…
सरस्विता पुरस्कार
14Jul2014ब्लॉगोत्सव-२०१४, राजनीति का गुण्डा : अविनाश वाचस्पति

‘गुण्डा’ जयशंकर प्रसाद की कहानी का किरदार किताब से बाहर निकलकर राजनीति में अपनी घनघोर उपस्थिति दर्ज करवा चुका है। अभी सप्ताह भर भी नहीं बीता है कि जब पीएम पद के प्रबल दावेदार ने सामने वालों को ‘गुण्डा’ कहकर सम्मानित कर दिया। इससे एक छिपा हुआ रहस्य सच बनकर सामने आ गया कि राजनीति में गुण्डों का…
ब्लॉगोत्सव-२०१४, ‘मैं कौन हूँ’ का आवरण और स्त्री एवं स्त्री-सशक्तिकरण

भारतीय दर्शन के मूल में एक प्रश्न उभरता है कि मैं कौन हूँ? दर्शन की अपनी अवधारणा, अस्तित्व को तलाशने और पहचानने का सूत्र। ‘मैं कौन हूँ’का दर्शन विशुद्ध दर्शन नहीं है, यह भारतीय सामाजिक-सांसारिक-पारिवारिक परम्परा में गुरु-शिष्य परम्परा के आदर्श शिष्य नचिकेता के प्रश्न ‘मैं कौन हूँ’के रूप में गुरुकुल…
ब्लॉगोत्सव-२०१४, चौबीसवाँ दिन, सुशांत सुप्रिय की कहानी: एक गुम-सी चोट
कैसा समय है यह जब बौने लोग डाल रहे हैं लम्बी परछाइयाँ --- ( अपनी ही डायरी से ) ---------------------------------------------------------…
ब्लॉगोत्सव-२०१४, तेईसवाँ दिन, डॉ अ कीर्तिवर्धन की कविता
कविता मिलता हूँ रोज खुद से, तभी मैं जान पाता हूँ, गैरों के गम में खुद को, परेशान पाता हूँ। गद्दार इंसानियत के, जो खुद की खातिर जीते, जमाने के दर्द से मैं, मोम सा पिंघल जाता हूँ। ढलती हुयी जिंदगी को, नया नाम दे दो, बुढ़ापे को तजुर्बे से, नयी पहचान दे दो। कुछ हँस कर जीते तो कुछ रोकर मरते हैं, किसी…
रश्मि प्रभा
माना सन्नाटा गहरा और लम्बा रहा
17Nov201222माना सन्नाटा गहरा और लम्बा रहा पर चुप की जुबान पर शहद से शब्द थे, हैं &...
दूसरे की ज़मीन तहस-नहस करने की होड़ वेब मीडिया के लिए खतरनाक
Jul 04, 20127वेब मीडिया यानि वह सूचना मंच , जहां हर विषय को हम आनन् फानन में पा सकते हैं, कहीं भी, किसी भी ...
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
Sep 28, 201120ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ म पर्वतों की चोटियों से शैलपुत्री का रूप लिए दसों दिशाओं से म...
प्यार इसे ही कहते हैं...
Jun 18, 201138मैं तख्तो ताज को ठुकरा के तुझको ले लूँगा दावे से कहा था सलीम ने ....... ले न सका इंग्लैण्ड के भावी...
कविता की कविता : बिन डोर के....
08Nov20127कुछ लोग उतर जाते हैं दिल में बिन आहट ,बिन दस्तक के जैसे हो प्रारब्ध का कोई रिश्ता खींचे चले आते है...
ठुकरा दिया मैंने खुदा
Aug 09, 20128बंद आँखों पे समझना न नींद का कहर धुंधला न जाएँ सपने सो पलकें गए हैं ठहर । खो गए हो दुनिया की भ...
आ गयी बदरिया
Jul 12, 20127किरणों ने अवशोषण कर नीर समुद्र कासजाया है श्वेत - श्याम श्रृंगार नभ काविरह अगन धधकाने आ गयी ब...
तुम नज़्म मेरी
May 09, 20127लताओं सी नाज़ुक यादें जब गहराने लगती हैं फि़ज़ां की खुशबू कुछ जानी पहचानी सी लगती है । ज़माने की ...
तुम्हारा जिंदा रहना जरूरी है गुल मकई !
18Oct201213"अपने हक़ और हकूक की हिफाजत में - क्यों भूल गयी मजहबी कायदे-कानून ? कच्ची उम्र मे- खिलौनों और गुड़...
अनुप्रास हुआ मन-मन्दिर, जीवन मधुमास हुआ !
Mar 20, 201111गात गात पात पात छलका है मधुमास प्रीत के गुलाल संग महका है अंग अंग कहता नशे में मन 'बरस बीता के अ...
कविताएँ
ग़ज़ल - प्राण शर्मा
08Oct201220शरीफों के तरह ही घर में आना सीख जाएगा लगेगी चोट जब वो घर चलाना सीख जाएगा कोई आत...
प्राण शर्मा की लघु कथा : उधार की महिमा
02Sep20127लघु कथा उधार की महिमा चित्र : गूगल से साभार मेरा एक मित्र है - सुमीत . द...
ग़ज़ल - प्राण शर्मा
13Aug201217बातों में कुछ ऐसे बोल सुना जाते हैं मीत अपने ही मनमें आग लगा जाते हैं चिंगारी फ...
और खाने की गुंजाइश नहीं रही
23Jul201219लघु कथा " भाई , कभी हमारी घर भी आओ न ? " आनंद ने कहा . " कहो , कब आऊँ ? पुरुषोत्तम ने प...
दो ग़ज़लें - प्राण शर्मा
11Jun201221(एक) केवल फूल भला लगता है तेरा धोखा है प्यारे एक तराशा पत्थर भी तो सुन्दर होता है...