कोई कहता है कि ’साहित्य समाज का दर्पण होना चाहिए’ तो किसी ने इस दर्पण में अपनी ही तस्वीर देखनी चाही। कुँवर नारायण कहते हैं कि "समाज की अनेक मूल्यवान चेष्टाएं होती हैं, जिन्हें यत्न से बचाना पड़ता है। उन पर बाजार का तर्क लागू नहीं होता। यह एक विकसित दुनिया और शिक्षित समाज की पहली जिम्मेदारी है कि उसके मूल्यवान सांस्कृतिक प्रयासों और निधियों का समुचित संरक्षण हो। यह एक ऐतिहासिक सचाई भी है कि अक्सर विषम समयों में साहित्य और कलाओं को बचाने में प्रबुद्ध शासकों, नागरिकों और व्यापारिक समुदायों की निर्णायक भूमिका रही है।" 

साहित्य की सर्वमान्य परिभाषा यही रही है कि ''साहित्य वही है जो समाज के यर्थात का चित्रण करे, समाज को समाज के सत्य से परिचित कराये।`` इसीलिए साहित्य को समाज का प्रतिबिम्ब  भी कहा जाता है।

  ब्लॉगोत्सव-२०१४ में आज हम वीडियो प्रस्तुति के माध्यम से आपको बताने की यह कोशिश कर रहे हैं कि क्या है साहित्य का मूल अभिप्राय-
  और अब आइये हिन्दी साहित्य के विविध आयाम का अवलोकन करते हैं- 

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