कविता 

आज सुबह सैर पर निकले, तो
हवा के कुछ और ही बयां थे,
नए बने सेक्टर के नीचे
मुर्दा खेत चिल्ला रहे थे,
नई-नई सड़कों पर टहलते लोग,
मानो कच्चे गमों, पगडंडियों का मज़ाक उड़ा रहे थे,
भयभीत खड़े जामुन के पेड़ की व्यथा
उसके लाचार अंग बता रहे थे,
बहते रजवाहे को बंद कर,
ये लोग किस मकान की नींब डाल रहे थे,
सेक्टर के ये सन्नाटे,
पक्षियों का मधुर कलरव याद दिला रहे थे,
करके वातावरण धुआँ धुआँ 'लफ्ज' ये लोग
कैसी खोखली प्रगति का राग गुनगुना रहे थे ?

जोगिंद्र सिंह "लफ्ज"
करनाल (हरियाणा)

4 comments:

  1. मानवों की बढ़ती लालसा ...कटते हुए जंगल और दूर खिसकते हुए खेत...विकास के नाम पर यही तो हो रहा है

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  2. अच्छी कविता।

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  3. अच्छी कविता।

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