माँ है,बहन है,अर्द्धांगिनी है 
फिर भी ..........प्रश्न क्यूँ है 
हत्या क्यूँ है 
हादसे क्यूँ हैं !!!


रश्मि प्रभा 
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क्या समझा है जमाना उसे 
किसी ने समझा भोग्या उसे 
किसी ने जरुरत की वस्तु मात्र
जरूरतों की भेंट चढ़ते प्रतिपल 
सीने में दबे उसके हरेक जज़्बात 
तलाशती निगाहें उसकी हर बार
होती लहुलुहान टकराके लगातार
कंक्रीट सी प्रथाओ व् कुरितियो से  
और जख्म उसकी रूह के रिसते 
नासूर बन पीड़ा उसकी कराहती 
कर पीड़ा को उसकी अनदेखा 
हर कोई कुचलने को आतुर घाव 
लेकिन इतने पर भी कहाँ घबराई 
फिर संभल कर हरी दूब सी 
अचल सबल खड़ी वो नज़र आई 
खुद हौसले का मरहम लगा उसने 
सहजे घाव रूह के और ओज से भरी 
फिर वो मुस्काती चल पड़ी लड़ने 
ज़माने की बेवफाई ओ रुसवाइयों से 
अभी बुझी नहीं उसके मन की आस 
आज भी है उसे संपूर्णता की तलाश 
जो क्षत विक्षत रूह को सहला उसकी 
सार्थक करे जीवन के सकल प्रयास ...............
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किरण आर्य

12 comments:

  1. रश्मि जी ह्रदय से आभार मेरे प्रयास को सही दिशा देने के लिए ...........शुभं

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  2. सार्थकता लिये सटीक लेखन ....

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  3. फिर संभल कर हरी दूब सी
    अचल सबल खड़ी वो नज़र आई
    खुद हौसले का मरहम लगा उसने
    सहजे घाव रूह के और ओज से भरी
    फिर वो मुस्काती चल पड़ी लड़ने

    नारी शक्ति को नमन करती इन सुंदर कालजयी पंक्तियों के लिए बहुत बहुत बधाई और आभार!

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  4. गहन व प्रबल भाव ...

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  5. क्या कभी सोच बदलेगा ? समाप्त होगी क्या कभी पूर्णता की खोज ?
    Latest postअनुभूति : चाल ,चलन, चरित्र (दूसरा भाग )

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  6. हर कोई कुचलने को आतुर घाव
    लेकिन इतने पर भी कहाँ घबराई
    फिर संभल कर हरी दूब सी
    अचल सबल खड़ी वो नज़र आई

    इसी हौसले को कायम रखना है. सोच में परिवर्तन अवश्यम्भावी है.

    सार्थक लेखन के लिए बधाई किरण जी.

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  7. आप सब का साथ बनाए हमारे दिन को खास - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  8. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (9-2-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  9. हरी दूब सी अचल..सबल..यही है नारी.;बहुत खूब

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