कुछ शब्द मेरी आत्मा से तुम ले लो 
कुछ मैं उठाती हूँ तुम्हारे अंतस की गहराइयों से 
प्रश्नों का हल निकालने की कोशिश मिलकर करते हैं ....



 रश्मि प्रभा 
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तुम्हारे और मेरे
प्रेम के बीच                                                      
पसरी ख़ामोशी की
स्पष्ट अभिव्यक्ति                                                                      
हमारी आँखों में उभरकर
अब इक प्रश्न सी                                                                          
नज़र आने लगी है ;

ख़ामोशी को शब्दों का
इक नया आयाम देने
और उसके अहसासों को
एक नया रूप देने की कोशिश में
हम दोनों ही
क्यों कुछ और खामोश
हो जाया करते हैं;

क्यों नहीं शब्दों से
अपना तारतम्य बनाये रखकर
अपनी ख्ह्वाहिशें
एक दुसरे से बाँट पाते हैं ;
उन्हें सतरंगी खुशियों में बदल पाते हैं;

क्यों ध्रुव तारे की सी चमक
हमारे कोरों पर ठहरे
अश्कों में नज़र आने लगी है;
चाहत के आसमान में
जो अपनी नियति
सदा ही अवश्यम्भावी
बनाये रखती है;

प्रेम में
येकैसी
अनिश्चितता है;
बिखर गयी है जो
हम दोनों के बीच
अनायास ही;
और खड़ी है
नागफनी के
अपने विराट  रूप में ;
चुनौती देते हुए हमें;
हमारे विशवास और समझ को ;
कि..भरोसा है अगर
तो बढ़ो आगे;
पार करो मुझको
और जीत लो
अपने उस प्रेम को
जो इस धरती पर
युगों युगों से
जीवित और स्थापित है
अपनी सम्पूर्ण गरिमा के साथ;

आओ और वो उत्तर
जो कैद है
हमारी ही खामोशियों के दायरे में ;
उन्हें अब हम ही मुक्त
और स्वीकार करें
सम्मान सहित
मेरे हम्न्फ्ज़ ....!!!


अर्चना राज !!

11 comments:

  1. प्रेम भी विवाद हो सकता है ... फिर प्रेम क्या नहीं हो सकता ...

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  2. बहुत सुन्दर...

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  3. वाह ... बेहतरीन

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  4. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त (समृद्ध भारत की आवाज़)
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  5. तेरे और मेरे बीच जरुरी नहीं शब्दों की भाषा ...
    तेरा दिल अक्सर सुन ही लेता है मेरे मौन की परिभाषाNeelima Sharma


    bahut khoob

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  6. न जाने क्यों निष्क्रियता की बेल ढक रही है संबंधों को। सुन्दर कविता।

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