करवटों की अनकही बातें 
होती हैं अनकहे लम्हों से 
अपनों से .......... 
सुबह तक नींद के इंतज़ार में ...



रश्मि प्रभा 

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रात से लेकर सुबह तक,जो रिश्ता है मेरा नींद से,
उसे थोडा बहुत निभाने की कोशिश करती हूँ.... रोज़... 
कई बार झगडती हूँ नींद से मैं... रोज़...
समझाती है एक ही बात मुझे वो.... रोज़...
फिर मना ही लेती है आखिर नींद मुझे .... रोज़....

"नहीं मुझसे प्रीत तुझे तो बिसरा दे खयाल ये तू....की 
सपने आएंगे इन आँखों में मीठे से !!
कुछ हसाएंगे कुछ शायद रुला भी जायेंगे....
पर क्या तू रह सकेगी उन सपनों के बिना ????
जो तुझे तेरे अपनों से मिला लाते हैं....
कभी-कभी परीलोक की सैर भी करा लाते हैं....
और कभी आकाश में स्वतंत्र विचरने का मौका देते हैं...
भूलाकर इस दुनिया के झंझट सारे तुझे अपनी एक अलग दुनिया में ले जाते हैं.... "

नहीं...!!
नहीं रह सकती उन सपनों के बिना मैं....!!
गले लगा ही लेती हूँ फिर नींद को.... रोज़... 
[228218_1923801049458_1075072626_2188893_5081073_n.jpg]और कहती हूँ क्यूँ सताती है तू मुझे.... रोज़.... 
आती नहीं है आँखों में नखरे हैं तेरे.... रोज़...
फिर मना ही लेती है आखिर नींद मुझे .... रोज़....


मीनाक्षी मिश्रा 

11 comments:

  1. बहुत ही बढिया।

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  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (8-12-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  3. बहुत सुन्दर ....
    मीनाक्षी को उसके बचपन से जानती हूँ....तब से उसको गीता कंटस्थ है...बहुत प्रतिभावान लड़की हैं...अशेष शुभकामनाएँ और स्नेह मिनाक्षी.

    आभार रश्मि दी..
    अनु

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  4. बहुत खूबसूरत है ख़्वाबों की दुनिया ,
    ख़्वाबों में रंगों को भरकर तो देखो |
    बहुत सुन्दर लेखनी |

    सादर

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  5. वाह, बहुत उत्कृष्ट कविता

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  6. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद रश्मि दी !!
    जो आपने मुझे इस लायक समझा ........

    सहृदय आभारी हूँ ...

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