जीवन की रस्साकस्सी 
और आंतरिक द्वन्द 
घर में रहूँ 
या जाऊं परदेस !.....





रश्मि प्रभा 
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पश्चिम, 
पूरब की 
खीच तान,
रच रहें 
द्वन्द,
विचलित है 
प्राण |

बाहर 
भागूँ,
अन्दर 
जागूँ,
है विकट प्रश्न,
मुश्किल 
निदान |

कभी 
मूल्य को
रखकर 
कोने में,
सुख पाऊ 
जग का 
होने में,
घुटते 
अन्तर से 
व्यथित हुआ,
कभी 
समय बिताऊ 
रोने में |

सोचूं 
बीते से 
बंधा हुआ
मै आज 
कहाँ उठ 
पाउँगा ?
कल तजा 
यदि, 
उठ गया भी 
जो,
अन्तर को 
रौंद 
न जाऊंगा ?

कभी, 
उन्मुक्त 
जीविका 
सीखा रही,
पश्चिम की 
हवा 
सुहाती है,
कभी 
सद्चरित्र,
सुगठित रहन,
पुरखो की 
मन को 
भाती है |


पश्चिम, 
पूरब की 
खीच तान,
रच रहें 
द्वन्द,
विचलित है 
प्राण |

बाहर

भागूँ,
अन्दर 
जागूँ,
है विकट प्रश्न,
मुश्किल 
निदान |
Sant Kumar

संत कुमार 

5 comments:

  1. सामयिक रचना .... !!
    आज अधिकत्तर लोग इस द्वन्द से परेशान - विचलित हैं !!

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  2. वाह ... बेहतरीन

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  3. द्वंद्व हर जगह ..... द्वंद्वों से घिरे हम...

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  4. वर्तमान में इसी द्वंद्व से परेशान है बहुत से लोग पर इन हालातों में विवेक से काम लेना चाहिए।
    अच्छी रचना।

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  5. बहुत अच्छी रचना , अगर सभी पंक्तियों को एक साथ भी लिखा गया होता तो भी कविता इतनी ही सुन्दर लगती |

    सादर

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