अंधविश्वास की गलियों मे,
जब कोई भटकता है,
उजाले मे भी सब धुंधला
ही दिखता है।
ये तो वो कोहरा है,
जो कभी नहीं छंटता है,
बढता ही बढता है।


अंधविश्वास की गलियों मे,
जब कोई भटकता है,
दल दल मे,
एक पांव रक्खा तो,
कंठ तक धंसता ही
धंसता है।
फिर निकल नहीं
सकता है।


अंधविश्वास की गलियों मे,
जब कोई भटकता है,
मदिरा का सा नशा
चढता है,
ये तो एक मदिरा है,
जिसका नशा गहरा है,
चढता ही चढता है,
कभी नहीं उतरता है।


अंधविश्वास की गलियों मे,
जब कोई भटकता है,
ये तो वो दीमक है,
मन को लग गई तो,
मस्तिष्क काम नहीं करता है,
क्षमताओं को निगलता है।



  • बीनू भटनागर

जन्म ०४ सितम्बर १९४७ को बुलन्दशहर, उ.प्र. में हुआ। शिक्षा: एम.ए. ( मनोविज्ञान, लखनऊ विश्वविद्यालय) १९६७ में। आपने ५२ वर्ष की उम्र के बाद रचनात्मक लेखन प्रारम्भ किया। आपकी रचनाएँ- सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी, माधुरी, सृजनगाथा, स्वर्गविभा, प्रवासी दुनियाँ और गर्भनाल आदि में प्रकाशित। आपकी कविताओं की एक पांडुलिपि प्रकाशन के इंतज़ार में हैं। व्यवसाय - गृहणी। सम्पर्क: ए-१०४, अभियन्त अपार्टमैंन्ट, वसुन्धरा एनक्लेव, दिल्ली, - ११००९६, मो. - 

6 comments:

  1. ये तो वो दीमक है,
    मन को लग गई तो,
    मस्तिष्क काम नहीं करता है,
    क्षमताओं को निगलता है। ekdam sahi kaha....

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  2. ACHCHHEE KAVITA KE LIYE BADHAAEE
    AUR SHUBH KAMNA BINU JI

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल २५/९/१२ मंगलवार को चर्चाकारा राजेश कुमारी के द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहां स्वागत है

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  4. अंधविश्वास दलदल सा
    सार्थक बिम्ब !

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  5. मार्मिक रचना

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  6. अंधविश्वास की गलियों मे,
    जब कोई भटकता है,
    ये तो वो दीमक है,
    मन को लग गई तो,
    मस्तिष्क काम नहीं करता है,
    क्षमताओं को निगलता है। सुन्दर अभिव्यक्ति बिनू जी समाज की बिद्रुप्ता को व्यक्त करती रचना

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