वहाँ जहां पर प्यार नहीं हो,
कैसे फूल बरसाएं,
दुःख के कांटे चुभते हो तो,
क्यों कर प्रीत निभाएं ?

चोट लगती हर वचन से,
नैनों जल बरसाएं,
मन उदास, तन शिथिल
पैरों को कैसे समझाएं?

सब अपने अपनी मस्ती में,
जब हमारी सुध बिसराएँ,
झूठे रिश्ते नाते हैं सब,
किस घर कैसे जाएँ?

() हेमंत कुमार दुबे 

3 comments:

  1. बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ...

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  2. दुःख के कांटे चुभते हो तो,
    क्यों कर प्रीत निभाएं ?

    चोट लगती हर वचन से,
    नैनों जल बरसाएं,

    वाह, कितनी बार ऐसा ही लगता है ।

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