बंद आँखों पे समझना न नींद का कहर
धुंधला न जाएँ सपने सो पलकें गए हैं ठहर ।

खो गए हो दुनिया की भीड़ में छोड़ मेरा दामन
वक़्त थम गया ,बहारें रूठ गयीं छोड़ मेरा आँगन ।

हम तो बैठे हैं पहलु में भूल हर खता को
किस गुनाह की सजा देते हो भूल मेरी सदा को ।

जीने का बहाना मिल गया उलझनों में तलाशते रास्ता
 वरन् फूल भरी जिंदगी के छलावे से होता बस वास्ता ।

अब भी खड़े हैं हम वहाँ रास्ते जहां से हुए जुदा
इक तेरी सूरत के वास्ते ठुकरा दिया मैंने खुदा ।

मिल जाओ गर भागती जिंदगी की जद्दोजेहद में
अजनबी सा ठिठक जाना पहचानी सी आहटों में ।

ढेर सारी यादों को देकर भूल जाने कहते हो
मानों सागर में मिली अश्कों को ढूंढ़ लाने कहते हो ।

आपकी बेरुखी ने मुझे आपका कायल बना दिया
 आपकी तसव्वुफ़ से रेगिस्तान में सहरा बना दिया ।

 कविता विकास 
http://kavitavikas.blogspot.in/

9 comments:

  1. वाह ... बहुत ही बढिया ।

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  2. वाह!! बहुत खूब...

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  3. अब भी खड़े हैं हम वहाँ रास्ते जहां से हुए जुदा
    इक तेरी सूरत के वास्ते ठुकरा दिया मैंने खुदा ।

    bahut khub

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  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट छाते का सफरनामा पर आपका ङार्दिक अभिनंदन है । धन्यवाद ।

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  5. बहुत ही खुबसूरत
    और कोमल भावो की अभिवयक्ति......

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