नदियाँ


हिम से जन्मी,
पर्वत ने पाली,
इक नदिया।
घाटी घाटी करती वो,
अठखेलियाँ।
अपने साथ लिये चलती वो,
बचपन की सहलियाँ।
फूल खिलाती,
कल कल करती,
खेले आँख मिचौलियाँ।
बचपन छूटा यौवन आया,
जीवन बना पहेलियाँ,
मैदानों मे आकर,
बढ गईं ज़िम्मेदारियाँ,
फ़सल सींचती ,हुई प्रदूषित,
रह गईं बस कहानियाँ।
सबका सुख दुख बाँटते
बीत गईं जवानियाँ।
जीवन संध्या मे अब,

पँहुच गईं तरुणाइयाँ।
मंद मंद होने लगीं,
मोहक अंगड़ाइयाँ।
सागर से जा मिली,
बढ़ गईं गहराइयाँ,
मानव जीवन की भी तो,
ये ही हैं कहानियाँ।

गाँव से शहर

नदिया के तीरे ,पर्वत की छाँव,
घाटी के आँचल मे मेरा वो गाँव,
बस्ती वहां एक भोली भाली,
उसमे घर एक ख़ाली ख़ाली,
बचपन बीता नदी किनारे,
पेड़ों के नीचे खेले खिलौने,
कुछ पेड़ कटे ,कुछ नदियाँ सूखी,
विकास की गति वहां न पंहुंची।
  
छूट चला इस गाँव से नाता,
         धुंए शोर मे घिर गई काया,
         लोग शहर के बड़े अलबेले,
         गमलों मे पेड़ो को लगायें,
         बौने पेड़ बौन्साई कहलायें,
          पर्वत से गिरते झरनों को,
घर मे लाकर वो सजायें,
         पशु पक्षी पलें पिजरों मे,
          इतवार को चिड़िया घर जायें।
  • बीनू भटनागर


बीनू भटनागर का जन्म ०४ सितम्बर १९४७ को  बुलन्दशहर, उ.प्र. में हुआ। शिक्षा: एम.ए. ( मनोविज्ञान, लखनऊ विश्वविद्यालय) १९६७ में। आपने ५२ वर्ष की उम्र के बाद रचनात्मक लेखन प्रारम्भ किया। आपकी रचनाएँ-  सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी, माधुरी,  सृजनगाथा, स्वर्गविभा, प्रवासी दुनियाँ और गर्भनाल आदि में प्रकाशित। आपकी कविताओं की एक पांडुलिपि प्रकाशन के इंतज़ार में हैं।  व्यवसाय - गृहणी। सम्पर्क:   ए-१०४, अभियन्त अपार्टमैंन्ट, वसुन्धरा एनक्लेव, दिल्ली, - ११००९६, मो. - ९८९१४६८९०५ ।

7 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर कविता

    कुँवर जी,

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  2. सुन्दर रचनायें।

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  3. नदी की जीवन गाथा और शहरों में खोते गाँवों की संस्कृति पर सुंदर , सार्थक प्रस्तुति !
    सादर !

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  4. AAPKEE KAVITAAYEN MAN MOH LETEE HAIN
    ISEE TARAH LIKHTEE RAHEN AUR LUBHAATEE RAHEN .

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  5. Kaafi acchi hai kavitayein!
    Nazar daaliye meri kavitaon par ummeed hai aap ko pasand aayengi
    http://navanidhiren.blogspot.in/search/label/Poem

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  6. Sundar Rachnayen Binu jee .... jiwan ki sachayi aur wastwikta se aut prot .

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