चिथरों में लिपटी
 दिखती है हर रोज 'वो'
 कि भीगोती है सर्द हवाएँ
 हर रात उसे

नयन कोर पर 
 'बेबसी' मुस्कुराती है 
 चेहरे की मुस्कराहट 
 बेबसी छुपा जाती है


छिड़ी है 'जद्दोजहद'
 खुद से लड़ने की 
 समेटे खुद को खुद में 
 मुक्त आसमां के नीचे
 धरा पर बिखरने की

बादल झूमे 
 सावन के उर में 
 पर सूखी हर तृष्णा 
 दिल के अंदर 
 'अकाल' पोषित हो रहा 
 प्यासा है वो 'भीत' समंदर

'वो' चीखती, चिल्लाती है 
 हर रोज कई बार
 पर सुनता कौन है 
 देख लो 'तमाशा' यह 
यहाँ हर कोई 'मौन' है

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शिवनाथ कुमार






10 comments:

  1. 'वो' चीखती, चिल्लाती है

    हर रोज कई बार

    पर सुनता कौन है
    देख लो 'तमाशा' यह
    यहाँ हर कोई 'मौन' है
    मन को छूते शब्‍द ... भावमय करती प्रस्‍तुति ..आभार

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  2. marmik rachna ...duniyan ka katu saty yahi hai

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  3. संवेदना को जगाती दिल को छूने वाली रचना ।

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (08-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  5. बहुत सुन्दर...दिल को छू गयी रचना

    अनु

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  6. सम्बेद्नाओं से ओत प्रोत.... एक उम्दा रचना....!!

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  7. बेबसी का शोर बहुत गंभीर है.

    सुंदर संवेदनशील कविता.

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  8. दिल के अंदर
    'अकाल' पोषित हो रहा
    प्यासा है वो 'भीत' समंदर


    बहुत सुन्दर !

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  9. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण |
    कभी मेरे ब्लॉग पर भी आइये |
    आशा

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  10. मर्मस्पर्शी रचना
    :-)

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