बरसों से इसी तरह ज़मीन में धंसी हुई -
श्रापग्रस्त -
तुम्हारी बाट जोहती हुई -मैं !
और तुम ...!!!
मुझसे विमुख -
रुष्ट -
असंतुष्ट -
मेरी पहुँच से कोसों दूर !!!!!

मेरे राम ...
क्यों नहीं विध्वंस कर जला देते -
श्रापग्रस्त स्मृतियों को  -
.....जो कुरूप हैं ....
और जिला देते .
वह जो सुन्दर है ...
जो परिस्तिथियों से-
अभिशप्त नहीं ......
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सरस दरवारी 

5 comments:

  1. मगर ऐसा होता कहाँ है

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति!

    इस प्रविष्टी की चर्चा शुक्रवारीय के चर्चा मंच पर भी होगी!

    सूचनार्थ!

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  3. मेरे राम ...
    क्यों नहीं विध्वंस कर जला देते -
    श्रापग्रस्त स्मृतियों को -
    .....जो कुरूप हैं ....
    और जिला देते .
    वह जो सुन्दर है ...
    जो परिस्तिथियों से-
    अभिशप्त नहीं ......

    बहुत गहन बात ... सुंदर प्रस्तुति

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति |
    आशा

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  5. सुन्दरम मनोहरं .
    वीरुभाई .
    शुक्रवार, 29 जून 2012
    ज्यादा देर आन लाइन रहना माने टेक्नो ब्रेन बर्न आउट
    http://veerubhai1947.blogspot.com/
    वीरुभाई ४३.३०९ ,सिल्वर वुड ड्राइव ,कैंटन ,मिशिगन ,४८,१८८ ,यू एस ए .

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