मोह से मोक्ष की यात्रा
कभी प्राप्य कभी अप्राप्य ...

रश्मि प्रभा

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उसकी खोज

वह खोजती है
उन शब्दों का साहचर्य
जहाँ आत्मा के पार का संसार
जीवित होता है,
और बांधता है पूरा आकाश,
वह खोजती है
उन क्षणों का सौन्दर्य
जहाँ शब्दों के बीच का मौन
महाकाव्य रचता है
सरल संस्तुतियों के साथ,
वह खोजती है
उन आत्मीय संबोधनों के स्वर
जहाँ पीड़ा भी संवरती है
निर्वसन निराकार,
वह खोजती है
उस तोष के कुछ सूत्र
जहाँ अथाह एकांत में
किया था उसने
मोक्ष से सहवास

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सुशीला पुरी
''लिख सकूँ तो - प्यार लिखना चाहती हूँ ठीक आदमजात - सी बेखौफ दिखना चाहती हूँ"

11 comments:

  1. *वह खोजती है
    उस तोष के कुछ सूत्र
    जहाँ अथाह एकांत में
    किया था उसने
    मोक्ष से सहवास*
    उम्दा सोच या ईच्छा या अभिलाषा की उत्तम अभिव्यक्ति .... !!

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  2. अल्फाजों की सादगी में कविता और भी खुबसूरत बन पड़ी है...बधाई आपको!

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  4. वह खोजती है
    उस तोष के कुछ सूत्र
    इस खोज का प्राप्य क्या है? खोज इस दिशा में भी तो हो...
    बहुत खूबसूरती से भावों को अभिव्यक्त किया है

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  5. एक उत्कृष्ट कविता।
    मोक्ष ही तो मानव-जीवन का लक्ष्य है।

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  6. bahut sundar prawahwali kavita

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  7. यही खोज तो सर्वोत्तम खोज है, ज़िन्दगी की खोज है, खुद की खोज है..
    सुन्दर!!
    सादर,
    मधुरेश

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  8. बेहतरीन प्रस्‍तुति।

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