कभी शब्द छोटे छोटे नज़र आते हैं
पर इनके मायने
राख के ढेर में दबी चिंगारी से कम नहीं ...

रश्मि प्रभा
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क़ानून ...

हमें क़ानून का उतना डर नहीं है
जितना डर इस बात का है
कि -
तुम्हारे हांथों में क़ानून है !
न जाने कब
यह कह दो कि -
तुमने क़ानून का उल्लंघन किया है
और हमें फांसी चढ़ा दो !!

हे ईश्वर ...

हे ईश्वर ! हे अन्तर्यामी ! हे पालनहार !
कब तक -
तू यूँ ही मेरी परीक्षा लेता रहेगा ?
कब तक -
तू यूँ ही मुझे झकझोरते रहेगा ?
कब तक -
तू यूँ ही मुझे हार-जीत में उलझाए रहेगा ?
मुझे मालुम है कि -
मैं तुझसे जीत नहीं सकता हूँ, इसलिए
तू आज से -
मेरी परीक्षा लेना बंद कर दे !
मैं जान गया हूँ कि -
तू मेरे अन्दर ही बैठा हुआ है !
बस इशारा करते चल -
जैसा तू चाहेगा, वैसा मैं करते चलूँगा !!


महा-भारत ...

आज, कोई दुर्योधन नहीं है !
लेकिन
धृतराष्ट्रों की संख्या में -
गड़बड़ झाला है !
संख्या, गिनने में पकड़ से बाहर है !
पता नहीं क्यों ? कोई समझाए !!
ये कैसा महा-भारत है ??

अंगार ...

जिंदगी-नुमा
चिलचिलाती धूप में
इंसान -
लू की तेज लपटों में
चलते चलते
न जाने कब, कैसे
खुद ही
अंगार बन जाता है
और -
खुद ही जलता है
खुद ही तपता है
खुद ही सहता है
फिर भी -
अनजानी राहों पे
धीरे धीरे -
आगे बढ़ते रहता है ...
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श्याम कोरी 'उदय'

17 comments:

  1. bahut achchi sarthak kshanikayen.
    mahabhaarat vishesh hai.

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  2. बहुत ही बढि़या ..बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिए आभार ।

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  3. तीनो ही रचनाये बेजोड ………आईना दिखाती हुई।

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  4. bahut hi breikise karigiri ki hai !
    uttam shilp!

    badhaiyan !

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  5. अनजानी राहों पर चलते रहना ही तपते हुए, जलते हुए यही तो जीवन की कीमत है...

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  6. आज, कोई दुर्योधन नहीं है !
    लेकिन
    धृतराष्ट्रों की संख्या में -
    गड़बड़ झाला है !
    संख्या, गिनने में पकड़ से बाहर है !
    पता नहीं क्यों ? कोई समझाए !!
    ये कैसा महा-भारत है ??

    badhiya prastuti.

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  7. प्रभावशाली रचनाएं . प्रस्तुति और उदय जी को बधाई

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  8. बहुत बहुत आभार ... सदैव स्नेह बना रहे ... आशा व विश्वास के सांथ अनंत, असीमित, अमिट शुभकामनाएं ...

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  9. "तुम्हारे हांथों में क़ानून है !
    न जाने कब
    यह कह दो कि -
    तुमने क़ानून का उल्लंघन किया है"

    वाह! बेहतरीन।

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  10. पता नहीं क्यों ? कोई समझाए !!
    ये कैसा महा-भारत है ??

    वाह! उदय जी! वाह!

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  11. तीनों रचनाएं परिवेश के विद्रूप का सार बिखेरती सी लगतीं हैं चारों ओर.

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  12. सार्थक संवेदनशील रचनाएं...
    आदरणीय श्याम जी को सादर बधाईयाँ....

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  13. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-741:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  14. ऐसे क़ानून से तो डरना ही होगा

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