तुम्हारे आस पास की खुशबू होती है ख़त में
जीने दो इसे
भर जाने दो रगों में
इसे औपचारिक मत बनाओ ...




रश्मि प्रभा




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ख़त को ख़त ही रहने दो

ख्वाबों को देखता हूँ
सीढियों से उतरते
गुज़रते
दबे पाँव
नज़रें चुराते
गलियारों से
और उधर
तुम्हारे तकिये कि नीचे
वो लम्हा
चुराकर रखा
है अब तक
और लिफाफे में
इश्क के
हज़ारों जगरातें
जुगनू तितली बादल मंजर
छोड़ो ख्वाबों की बातें
तुम कहो
जूही के पौधे पर
फूल आ गए होंगे अब तो
क्या कहा
कैसे जाना
तुम्हारे ख़त में
खुशबू आती है उसकी
और हाँ
अगर हो सके
ख़त को ख़त ही रहने दो
ई मेल मत बनाओ
बेजान सी लगती हैं बातें
Santosh Kumar





संतोष कुमार

12 comments:

  1. चिट्ठी जैसा अपनापन और कहाँ !

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  2. वाह क्या बात कही है।

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  3. वाह ...बहुत बढि़या।

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  4. रश्मि प्रभा जी बहुत बहुत शुक्रिया
    बहुत बहतु आभार !

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  5. .बहुत बढि़या..रश्मि जी..आभार..

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  6. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा शनिवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!चर्चा मंच में शामिल होकर चर्चा को समृद्ध बनाएं....

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  7. बड़ी प्यारी रचना.... आदरणीय संतोष जी को बधाई...
    सादर आभार....

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  8. बेहतरीन अभिवयक्ति.....

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  9. आपकी सुन्दर रचना पढ़ी, सुन्दर भावाभिव्यक्ति , शुभकामनाएं.

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  10. sach me email me vo chiththi jaisi khoobsurti,apnapan kahan.

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  11. बहुत ही सुन्दर और लयबद्ध रचना

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  12. yaad aa gaya bahut kuchh beeta hua jo ab tak guzra nahi

    naaz

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