दिन किस कदर बदल गए
तेरी खुशबू के बगैर
पंछी भी उदास हो गए ...


रश्मि प्रभा
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पंछियों ने इन्हें छुआ भी नहीं....

ज़िक्र होता नहीं जवानों में,
लोग गिनने लगे सयानों में.

होगा अपना भी खरीदार कोई,
सज गए हम भी अब दुकानों में.

वो मोहब्बत नहीं मिलेगी कहीं,
जो मोहब्बत है माँ के तानों में.

एक कमरे का घर तो बेच दिया,
कई कमरे हैं अब मकानों में.

इश्क का कारोबार चल निकला,
प्यार बनता है काखानों में.

ज़िक्र दुश्मन का कर रहे हो तुम,
नाम मेरा भी है बयानों में.

फिर बहाना करो ना आने का,
इश्क जिंदा है बस बहानों में.

पंछियों ने इन्हें छुआ भी नहीं,
तेरी खुशबू कहाँ थी दानों में.

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अखिल 

20 comments:

  1. वाह! साहब! वाह!

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  2. एक कमरे का घर तो बेच दिया,
    कई कमरे हैं अब मकानों में.

    पंछियों ने इन्हें छुआ भी नहीं,
    तेरी खुशबू कहाँ थी दानों में.

    वाह वाह वाह ………………क्या खूब लिखा है दिल को छू गयी।

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  3. पंछियों ने इन्हें छुआ भी नहीं,
    तेरी खुशबू कहाँ थी दानों में.

    वाह ...बहुत खूब ।

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  4. बहुत सुंदर रचना
    क्या कहने

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  5. wah ji, padhkar behad acha laga

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  6. कल 16/11/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है।

    धन्यवाद!

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  7. वो मोहब्बत नहीं मिलेगी कहीं,
    जो मोहब्बत है माँ के तानों में.

    एक कमरे का घर तो बेच दिया,
    कई कमरे हैं अब मकानों में.

    bahut sundar rachna !

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  8. बहुत सुंदर रचना...

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  9. एक कमरे का घर तो बेच दिया,
    कई कमरे हैं अब मकानों में.

    पंछियों ने इन्हें छुआ भी नहीं,
    तेरी खुशबू कहाँ थी दानों में.
    in panktiyon ne to kavita me jaan dal di.vaah.

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  10. दिन किस कदर बदल गए
    तेरी खुशबू के बगैर
    पंछी भी उदास हो गए ...
    ekdam yahi hua......

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  11. इश्क का कारोबार चल निकला,
    प्यार बनता है काखानों में.
    sahi varnan kiya hai......

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  12. एक कमरे का घर तो बेच दिया,
    कई कमरे हैं अब मकानों में.
    वाह!

    हर पंक्ति गहरी संवेदनाओं की वाहक है!
    शुभकामनाएं!

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  13. बेहद संजीदा खूबसूरत ग़ज़ल...

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  14. पंछियों ने इन्हें छुआ भी नहीं,
    तेरी खुशबू कहाँ थी दानों में.

    वाह ...बहुत खूब ।

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  15. Badalte haalat se upji wahi purani shikayatein.. naye andaaz me.. behad khubsurat

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  16. उम्दा अशआर....
    सुन्दर ग़ज़ल...
    सादर बचाई...

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  17. बहुत ही सुंदर ग़ज़ल.

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