जाने कितना कुछ छूटता जा रहा है
अंत में रह क्या जायेगा ...



रश्मि प्रभा

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कही छूट जाना एक 'चकरी ' का


इस बार मैं दीपावली पर बैंगलोर न जा सकी । बच्चों के बिना त्यौहार फीका न लगे इसलिये मयंक ही यहाँ आगया ।
मयंक में बचपन से ही छोटी-छोटी चीजों को भी जितने विस्तार संवेदना व गहराई से देखने की क्षमता है, मुझमें आज तक भी नही है। आज वह बहुत सारे पटाखे, फुलझडियाँ ,अनार और चकरियाँ खरीद लाया । चकरी उसे खास तौर पर पसन्द है । जब बेशुमार किरणों के साथ वह पूरे आँगन में चक्कर लगाती हुई घूमती है तो लगता है जैसे यह विष्णु भगवान का चक्र है जो अँधेरे को काट रहा है । या अँधेरे की नदी में बेहद चमकीला भँवर है जो धारा को अवरुद्ध कर फैलता जा रहा है या फिर आसमान से बिछडा कोई सितारा है जो जमीन पर गिर कर आकुल हुआ घूम रहा है ।
बाजार से आते ही उसने बैग से निकाल-निकाल कर मुझे सारी चीजें दिखाईं । तेज धमाके वाले कई बम ,कई तरह की फुलझडियाँ ,अनार ,रेल और ...चकरियाँ..
"अरे !चकरियों वाला डिब्बा कहाँ है माँ ? पूरा डिब्बा था । काफी बडी चकरियाँ लाया इस बार जो देर तक घूमतीं हैं ।"
"अच्छा ! लेकिन बेटा भला मैं कैसे जान सकती हूँ ! लाकर तो तूने ही रखा है । ठीक से देख । होगा यहीं कहीं । जाएगा कहाँ!"
मैं पूजा सजाने में व्यस्त थी लेकिन वह यहाँ वहाँ ढूँढने लगा तो मैं भी उसके साथ देखने लगी और कुछ चिन्तित भी हुई । न केवल उसकी खुशी का खयाल करके बल्कि पैसों के व्यर्थ चले के कारण भी । लेकिन मुझे देख कर वह झटके से बोला --"छोडो माँ , जाने दो ।"
रात को सोने से पहले वह काफी संजीदा था । मेरे पूछने पर कहीं डूबती हुई सी आवाज में बोला--"याद है माँ, जब हम छोटे थे तब हम कैसे एक-एक रुपया जोड कर पटाखे -फुलझडियाँ लाते थे और एक-एक चीज को एक-एक चीज को कैसे गिन-सहेज कर रखते थे ! एक भी फुलझडी या चकरी कम होजाने पर जैसे सारा गणित ही गडबडा जाता था हमारा ।"
"अब इतना सोचने की क्या बात है बेटा ! यह तो समय-समय की बात है देख ना, अब चकरी का पूरा डिब्बा कहीं छूट गया पर चिन्ता तो नही हुई न ! तू चाहे तो एक क्या दस डिब्बे फिर खरीद कर ला सकता है ।"-मैंने कहा ।
"यही तो माँ !"-- वह कहीं खोया हुआ सा कहने लगा---कहाँ तो एक चकरी का कम होना ही अखर जाता था कहाँ अब पूरा डिब्बा खोने का भी कोई मलाल नही । यह बेशक हमारी आर्थिक उन्नति का सूचक है । पर प्रतीकात्मक रूप से ये -"छोडो, जाने दो" जैसी तसल्लियाँ क्या उस संवेदन-शून्यता को नहीं दर्शातीं जिसके चलते किसी भी भावनात्मक क्षति को अब सहजता व हल्केपन से लिया जाना एक जरूरत बन रहा है । उस एक चकरी से मिली खुशी को हम किसी कीमत पर खरीद नही सकते जिसे पाने के लिये हम बडे उत्सुक रहते थे और उसे प्राणपण से सहेज कर भी रखते थे । शायद हम उस 'चकरी' के प्रति लापरवाह हो चले हैं जो हमारे जीवन को सरस व समृद्ध बनाती है और माँ यह तो बताने की बात नही है न कि समृद्धि केवल पैसा आजाना नही है ।"
उसकी बातें सुन कर मैं आश्वस्त तो होती हूँ पर कहीं चिन्तित भी । पता नही क्यों।

गिरिजा कुलश्रेष्ठ

14 comments:

  1. वक्त के साथ बहुत कुछ बदलता है मगर अन्तस नही।

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  2. सुंदर विचार. उम्र और समय के अनुरूप लोगों में भी बदलाव आते ही है।

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  3. जीवन को समृद्ध करने वाले एहसास की जगह पैसा कभी नहीं ले सकता!
    अच्छी प्रस्तुति!

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  4. सुन्दर रचना ...और एक गहन चिंतन ... हमारी आती हुवी समृधि कही हमें जीवन की तम्माम उन छोटी छोटी वस्तुवों के लिए भावशून्य बनाती जा रही हैं जो खुशियों का आधार हो... पैसा ही खुशियों का मन्त्र नहीं...

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  5. सुन्दर रचना ...और एक गहन चिंतन ... हमारी आती हुवी समृधि कही हमें जीवन की तम्माम उन छोटी छोटी वस्तुवों के लिए भावशून्य बनाती जा रही हैं जो खुशियों का आधार हो... पैसा ही खुशियों का मन्त्र नहीं...

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  6. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  7. बहुत खूबसूरत.

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  8. कुछ चीजें पैसे से नहीं खरीदी जा सकती इन्हीं अहसासों कि तरह. अच्छी प्रस्तुति

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  9. जब बच्चे संजीदा हो जायें तो चिंता लाज़मी है...संवेदनशीलता से बच के रहना ज़रूरी है...कम से कम उनके लिए...

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  10. रश्मि जी ,मेरी पोस्ट को वटवृक्ष में लेने का बहुत-बहुत धन्यवाद ।

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  11. एक गहन चिंतन और सुन्दर रचना ....

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  12. मुठ्ठी में समेटी हुई खुशियां अपनी सी लगती हैं लेकिन पूरे वातावरण में फैली ये खुशियां साधारण बन जाती हैं और हम संवेदनशील नहीं रह पाते। थोडें-थोडे को समेटना और उसमें खुशी तलाशना बस यही जीवन की पूंजी है। बहुत अच्‍छा संस्‍मरण।

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