हल तुम चलाते हो
पसीने की ईमानदार उम्मीदों से
ख्वाब तुम देखते हो
तो अपने लहलहाते फसल का मान रखो
अपने हक़ की लकीर गहरी खींचो.....



रश्मि प्रभा




=================================================================
कुदाल से त्योरियां ~~


रोटियाँ उगाने के लिये
धरती के माथे पर
खींचते रहे तुम
अनगिनत लकीरें;
लहलहा उठीं रोटियाँ
अधजली; अधपकी और
पकी रोटियाँ
वे तुम्हारे उगाये रोटियों में से
अधजली और अधपकी
तुम्हें खैरात में देते रहे,
और पकी रोटियों को
’स्विस बैंक’ का रास्ता दिखा दिया
तुम सपाट माथा लिये
चुपचाप देखते रहे; चमत्कृत से
रोटियों के सफर को.

तलाश में क्यों हो
किसी शिल्पकार की अगुवाई का
अपने कुदाल से
खुद ही क्यों नही खींच देते
अपने माथे पर
त्योरियों की लकीरें
ताकि तैनात कर सको
इन्हें हर उस रास्ते पर
जिनसे होकर
इन रोटियों का सफर होता है

My Photo






m verma

10 comments:

  1. bahut uttam sashaqt abhivyakti.har kisi ko apna sahi haq milna chahiye nahi milega to tyoriyon ki lakeeren to kheechni hi padegi.

    ReplyDelete
  2. बेहद गहन अभिव्यक्ति।

    ReplyDelete
  3. बहुत खूब।.. .दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं..

    ReplyDelete
  4. हक़ के लिए आवाज़ उठाने का आह्वान करती गहन अभिव्यक्ति!

    ReplyDelete
  5. bahut sundar rachna prastuti ke liye aabhar!

    ReplyDelete
  6. वट वृक्ष के तले एक और सशक्त अभिव्यक्ति।

    खुद ही क्यों नही खींच देते
    अपने माथे पर
    त्योरियों की लकीरें
    ताकि तैनात कर सको
    इन्हें हर उस रास्ते पर
    जिनसे होकर
    इन रोटियों का सफर होता है
    ...त्योरियों को तैनात करने की कला अब सीख रहा है भारतीय किसान। स्व0 चंद्रशेखर मिश्र जी कि कविता याद आ रही है...

    तोरी के पताल के अकाश में उछाल देबे
    ढाल देबे पानी-पानी पूरा एक दान में
    रूठ जाये अदरा अ बदरा भी रूठ जाय
    भदरा न लागे देब खेत खलिहान में।

    ReplyDelete
  7. लाजवाब अभिव्यक्ति
    आपको व आपके परिवार को दीपावली कि ढेरों शुभकामनायें

    ReplyDelete
  8. गहन अभिवयक्ति.....

    ReplyDelete
  9. bhaut hi khubsurat... happy diwali...

    ReplyDelete

 
Top