पीछे देखो तो साया नज़र आता है
उनके सवालों से परे मन कई सवाल करता है
और खुद में हारा थका नींद के लिए बेचैन होता है ...


रश्मि प्रभा

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चौराहा

ज़िन्दगी के इस मोड़ पर
जब पीछे मुड़कर देखता हूँ ,
दिखाई देते हैं
चौराहे,
कितने मोड़
जिन्हें मैंने लिया नहीं,
कितने बढे हुए हाथ
जिनको थामा नहीं,
या फिसल गए
मेरी पकड़ से.


लेकिन किसने रोका मुझे
उन मोड़ों पर बढ़ने से,
उन हाथों को थामने से.
किसे दोष दूं
इस सबका ?
मेरा कायरपन,
कर्मफल,
परिस्थितियाँ,
संयोग
या प्रारब्ध.
या यह प्रयास है मेरा
अपनी गलतियों का ठीकरा
दूसरों के सर फोड़ने का.


अब भी आते हैं
सपने में
वे छोड़े हुए मोड़,
वे बढे हुए हाथ,
और उठाते हैं
इतने सवाल
जिनका ज़वाब देने का
समय फिसल गया है
मेरे हाथों से.


अब तो मुझे
हर चौराहे पर
कोई रास्ता चुनने में
लगता है बहुत डर,
शायद
यह मोड़ भी गलत न हो.
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कैलाश सी शर्मा

21 comments:

  1. अब तो मुझे
    हर चौराहे पर
    कोई रास्ता चुनने में
    लगता है बहुत डर,........

    वाह! कमाल की स्वीकारोक्ति है, जो एक दम सत्य भी है!

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  2. अब तो मुझे
    हर चौराहे पर
    कोई रास्ता चुनने में
    लगता है बहुत डर,
    शायद
    यह मोड़ भी गलत न हो.

    वाह ...बहुत ही बढि़या ।

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  3. बहुत ही बढि़या ।

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  4. बहुत खूब ...बेहतरीन लिखा है आपने

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  5. बहुत सुंदर
    क्या कहने

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  6. सुंदर कविता !

    अब जो सजगता आ गयी है वह बीते हुए समय की ही तो देन है... हम जो भी करते हैं वह अन्ततः हमें और परिपक्व ही बनाता है... जीवन में पश्चाताप की कोई जगह नहीं...

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  7. शायद जिंदगी की यही सच्चाई है,कोई भी निर्णय लेने से पहले जिंदगी हमको हमेशा ऐसी मोड पर लाकर खड़ा कर देती है, की सही रास्ता कोन सा है यह चुन्ना मुश्किल हो जाता है और अकसर जिंदगी के यह चुने हुए रास्ते आगे आने वाले समय में जाने क्यूँ....
    हर चौराहे पर
    कोई रास्ता चुनने में
    लगता है बहुत डर,
    शायद
    यह मोड़ भी गलत न हो....
    जिंदगी की सच्चाई को बयां करती सटीक एवं खूबसूरत अभिव्यक्ति....

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  8. अब तो मुझे
    हर चौराहे पर
    कोई रास्ता चुनने में
    लगता है बहुत डर,.....bahut sundar....

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  9. bahut sachhi rachna...sarthak lekhan..bahut bahut badhai.

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  10. आदरणीय रश्मि जी, मेरे चौराहे को वटवृक्ष की छाया प्रदान करने के लिये आभार .

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  11. बीते दिनों की यादों के कुछ कड़वे अनुभवों को दर्शाती खूबसूरत रचना |

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  12. चौराहे,
    कितने मोड़
    जिन्हें मैंने लिया नहीं,
    कितने बढे हुए हाथ
    जिनको थामा नहीं,
    या फिसल गए
    मेरी पकड़ से....

    बहुत सुन्दर भाव

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  13. Sharma Ji ko badhai.. Vatvriksh mein rachnaon ka prakashan hi garv ki baat hai..

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  14. चौराहों से डर कैसा...एक ना एक मोड़ तो मुड़ना ही है...

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  15. आपकी पोस्ट ब्लोगर्स मीट वीकली (९) के मंच पर प्रस्तुत की गई है आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत कराइये/आप हमेशा अच्छी अच्छी रचनाएँ लिखतें रहें यही कामना है /
    आप ब्लोगर्स मीट वीकली के मंच पर सादर आमंत्रित हैं /

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  16. kavita bilkul sateek hai... magar jo raah pakad li wahi apni hoti hai... jo hamari nahi wo hamare saath nahi... bas...
    ab un mod ko dekhkar kya pachhtana... ho sakta hai ki wo aur bhi mushkilon se bhari hoti...

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  17. गहन चिंतन करती ज़िंदगी का ...अच्छी प्रस्तुति

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