मुझे नहीं पता मुझे क्या चाहिए
मोम की तरह कतरा कतरा
मेरे भीतर कुछ पिघलता है
क्रोध बेमानी नहीं ... कोई हल नहीं ...
चीख गले में तैरती है
और मैं हारकर
घूंट घूंट सारी चीख पी जाती हूँ ...


रश्मि प्रभा
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न, अब मुस्कुराते नहीं बनता...

जब गुस्से से नसें फटने लगती हैं तो मुस्कुराते नहीं बनता, जब मुस्कुराते नहीं बनता, तब बुरा समझते हैं लोग मुझे, जब वो बुरा समझते हैं, तब मुझे एक राहत महसूस होती है कि सहज हूं अब, जब राहत महसूस होती है सहज होने की तो पलटने लगती हूं ब्रेख्त, पाश, आजाद को, उन्हें पलटने के बाद देखने लगती हूं अपने देश को, राजनीति को, गले में पड़े 66 मनकों की माला को, गिनने लगती हूं होने वाले धमाकों को, यूं बिना किसी धमाके के भूख से मरने वालों की संख्या भी कम नहीं है देश में, न अपने ही देश में जीने का अधिकार मांगने वालों की, फिर अचानक हंस पड़ती हूं. बहुत जोर से हंस पड़ती हूं इतनी तेज कि चाहती हूं विषाद के सारे शोर और रूदन पर डाल दूं अपनी खोखली और निर्जीव हंसी की चादर. समेट लूं सारा दर्द अपनी हंसी में और मुक्त कर सकूं धरती को पीड़ा से. लेकिन मैं कोई नीलकंठ नहीं, न अलादीन का चिराग है मेरे पास. मेरी हंसी लौट आती है निराश होकर मेरे पास.

और तब कुछ ख्याल यूँ पिघलते हैं ... प्रतीत होता है

सितारे डुबकियां ले रहे थे समंदर के भीतर


पिघल रहा था
पत्थर के भीतर का मोम
खिल रहे थे
चाकुओं की धार पर फूल
रात के भीतर उग आये थे
चमकते हुए दिन
धरती के गर्भ से
जन्म लेने लगा था आसमान
आग के भीतर से झांक रही थी
बेहिसाब शीतलता
सितारे डुबकियां ले रहे थे
समंदर के भीतर
जब लिखी जा रही थी
प्रेम कहानी


प्रतिभा कटियार


5 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर रचना....

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  2. बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  3. बहुत सुन्दर रचना..

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  4. क्या कहने, बहुत बढिया.

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  5. बेहद गहन अभिव्यक्ति।

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