मन तो मन है
अपने ही सपनों ख्वाहिशों के बीच
साँसों से दूर होने लगता है
फिर अपने ही भीतर से निकल
ढूंढता है कुछ अपना
कुछ धरती कुछ आकाश ....




रश्मि प्रभा
=====================================================================
प्रतिध्वनि

एक शाम
भीतर की ऊमस और बाहर के घुटन से घबराकर
निकल पड़ा नदी के साथ-साथ
नदी जो नगर के बाहर
धीरे-धीरे बहे जा रही है

अब यह जो बह रहा है वह कितना पानी है
कितना समय कहना मुश्किल है ?

बहरहाल शहर के चमक और शोर के बीच
उसका एकाकी बहे जाना
मुझे अचरज में डाल रहा था
जैसे यह नदी इतिहास से सीधे निकल कर
यहाँ आ गयी हो
अपनी निर्मलता में प्रार्थना की तरह

कोई अदृश्य पुल था जो जोड़ता था
बाहर के पानी को भीतर के जल से
कि जब पुकारता था बाहर का प्रवाह
टूट कर गिरता था अन्दर का बांध

जो बाहर था
मुक्त कर रहा था भीतर को .



अरुण देव

12 comments:

  1. Bahut hi gahrai se bhav vyakt kiye hain Arun ji aapne.. Aabhar..

    ReplyDelete
  2. बहुत गहन अभिव्यक्ति ...

    ReplyDelete
  3. क्या बात है
    बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  4. अरुण जी की सुन्दर कविताओं में एक... इसे साझा करने के लिए रश्मि जी का धन्यवाद ...और रश्मि जी के शब्द भी हमेशा की तरह बेजोड ..

    ReplyDelete
  5. कोई अदृश्य पुल था जो जोड़ता था
    बाहर के पानी को भीतर के जल से
    कि जब पुकारता था बाहर का प्रवाह
    टूट कर गिरता था अन्दर का बांध

    जो बाहर था
    मुक्त कर रहा था भीतर को .


    अद्भुत

    ReplyDelete
  6. बहुत ही दिलकश और रूमानी ख्यालात

    ReplyDelete
  7. कोई अदृश्य पुल था जो जोड़ता था
    बाहर के पानी को भीतर के जल से
    कि जब पुकारता था बाहर का प्रवाह
    टूट कर गिरता था अन्दर का बांध

    जो बाहर था
    मुक्त कर रहा था भीतर को .

    man ko sprsh karti huii kavitaa

    ReplyDelete

 
Top