शब्दों की भी एक सीमा होती है
कहने की भी एक हद होती है... पर हम कहाँ चुकने देते हैं शब्दों को , उसमें रंग भरते रहते हैं , फिर उसे नया अंदाज देते हैं ...
कहने की हद ! होती तो है , पर हम हदों को कहाँ मानते हैं ... शायद की उम्मीद लिए कहते रहते हैं ... तब तक जब तक एक सन्नाटा न पसर जाए !




रश्मि प्रभा
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फिर वही शब्दों का विहंगम जाल..........


आज फिर शब्द ना जाने क्यूँ चूक से गए हैं
शब्दों का विहंगम जाल
जो मैं हमेशा तुम्हारे आस-पास बुना करती हूँ
खाली प्रतीत होता है
वही शब्द...... कितनी बार दोहराऊँ
अपनी मन:स्तिथि
तुम्हें कितनी बार दिखलाऊँ

उस तुम को........ जो हो कर भी
कहीं है ही नहीं
_________

शब्दों की भी एक सीमा होती है
कहने की भी एक हद होती है
समझते-बूझते
क्यूँ उस 'तुम' को पुकारती हूँ
जो इस जीवन के रहने तलक
मेरा है ही नहीं ........
__________

अपने प्रिय की बात करते-करते
किसी का हृदय बिलखता है
तो किसी की आँखें बोझिल हो जाती हैं
पर मेरे तो अब अहसास तक टीसने लगे हैं
आत्मा का कम्पन निस्तेज़ करने लगा है
इस ____ जीवन को

जीते जी अपने शरीर से अलग होने की व्यथा
शायद किसी ने ना जानी होगी
पर मैं जी रही हूँ
इस सत्यार्थ के साथ

तुम ....... जो हो ही नहीं
उस "तुम्हारे" इंतज़ार के साथ
पर कब तक ............ आखिर कब तक ?
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गुंजन

9 comments:

  1. wow... gunjan ji, bahut khoob...

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  2. हद तक पहुँच गयी हैं
    मेरी नाउम्मीदियाँ ..
    फिर भी है कि मैं
    जिए जाती हूँ

    बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  3. .....जीते जी अपने शरीर से अलग होने की व्यथा
    शायद किसी ने ना जानी होगी
    पर मैं जी रही हूँ
    इस सत्यार्थ के साथ".....

    वाह!

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  4. जीते जी अपने शरीर से अलग होने की व्यथा
    शायद किसी ने ना जानी होगी
    पर मैं जी रही हूँ
    इस सत्यार्थ के साथ

    सुन्दर प्रवाहमयी प्रास्तुती

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  5. बहुत खूबसूरत है ...हर शब्द किसी को पुकारता हुआ .... बहुत बहुत बधाई इस कविता के लिए आपको...गुंजन जी

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  6. शब्द शब्द बोलत है आपकी कविता का गुंजन जी ...बहुत खूब....

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