खुली किताब

और मैं ....
एक ग़ज़ल , एक गीत
एक शाम , एक उदासी
प्रकृति की ओट से उगता सूरज ...
अनगिनत परिभाषाओं के शब्दों में लिपटी मैं ...
कई बार पढ़ा है खुद को
कई बार सुलझाया है खुद को
कई बार बन्द किया है खुद को
आज नए जिल्द में फिर हूँ ..........


रश्मि प्रभा
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मैं कौन हूँ ?

मैं वो कविता हूँ
जो कोई क़लम न लिख पाई
रात के सन्नाटों में
तन्हाइयों का शोर
ज्वालामुखी बन कर उबल पड़ा,
इक दर्द जो सदियों से
चट्टान बनकर मेरे भीतर जम गया था
वही पिघलकर
एक पारदर्शी लावा बनकर बह गया
जब मैं खाली हुई
तब जाकर जाना कि मैं कौन हूँ

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खुली किताब

सोच की सिलवटें
मेरी पेशानी पर तैरती है
और जैसे ही
वो गहरी हुई जाती हैं
एक उलझन बनकर
चहरे की झुर्रियों के साथ
तालमेल खाती
मेरे माथे पर एक छाप छोड़ जाती है
और उस वक़्त
एक खुली कि़ताब का सुफ़्आ
बन जाता है मेरा चहरा
जिसे, वक़्त के दायरे में
कोई भी पढ़ सकता है.






देवी नागरानी

20 comments:

  1. Bahut hi acchhi rachna... khuli baat...main kaun hun.. Aabhar...

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  2. वाह ...बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ...आभार ।

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  3. जिसे, वक़्त के दायरे में
    कोई भी पढ़ सकता है.

    bahut sunder bhav...

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  5. अच्छी प्रस्तुति

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  6. जिसे, वक़्त के दायरे में
    कोई भी पढ़ सकता है...बहुत कुछ कहती ये चंद पंक्तिया....

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  7. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ...आभार ।

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  8. बहुत सुन्दर रचना! शानदार प्रस्तुती!

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  9. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  10. बहुत ही भावयुक्त रचना!!

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  11. wow... amazing...
    bahut hi pyara execution hai...
    awesome...

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  12. देवी नागरानी जी की दोनो ही प्रस्तुतियाँ लाजवाब हैं …………दिल को छू गयीं।

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  13. सरल शब्दों में गहन अभिव्यक्ति!
    आभार!

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  14. दोनों ही रचनाएं बहुत अच्छी लगी

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  15. behtreen kavitayen gahan bhaavon ki anubhuti karati hain.

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  16. एक -एक शब्द अपनी जमीं रखता है ,एक -एक शब्द अपनी कहानी कहता है जो दिल में घर कर लेती है |
    प्रशंसा शब्दों से परे है |
    सुधा भार्गव

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  17. वी नागरानी जी की दोनो ही प्रस्तुतियाँ लाजवाब हैं !

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  18. Sabse pahle main Rashim Prabha ji ki abhari hoon mujhe is manch par shamil karne ke lliye. sudhee pathakon ki tahe dil se shukrguzaar hoon jo mere prayasoo mein mere hamsafar bane hain.
    Ek sher aap sabhi ki shaan mein :
    kaha kisne in kore kagazon se kuch nahin milta
    Likhi tahreer padhne se mile kiradaar ki khushboo

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  19. खुद को पहचानने की खुबसूरत कोशिश
    अच्छी रचना

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