चेतन ,अचेतन , परोक्ष, अपरोक्ष
इसे वही देख सकता है
जिसमें व्याकुलता हो एकलव्य सी
निष्ठा हो प्रह्लाद सी
जो विनीत हो अर्जुन सा....

 
रश्मि प्रभा 
 
 
 
 

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नहीं दैन्यता और पलायन


अर्जुन का उद्घोष था 'न दैन्यं न पलायनम्'। पिछला जीवन यदि पाण्डवों सा बीता हो तो आपके अन्दर छिपा अर्जुन भी यही बोले संभवतः। वीर, श्रमतत्पर, शान्त, जिज्ञासु, मर्यादित अर्जुन का यह वाक्य एक जीवन की कथा है, एक जीवन का दर्शन है और भविष्य के अर्जुनों की दिशा है। यह कविता पढ़ें अपने उद्गारों की ध्वनि में और यदि हृदय अनुनादित हो तो मान लीजियेगा कि आपके अन्दर का अर्जुन जीवित है अभी। उस अर्जुन को आज का समाज पुनः महाभारत में पुकार रहा है।


मन में जग का बोझ, हृदय संकोच लिये क्यों घिरता हूँ,
राजपुत्र, अभिशाप-ग्रस्त हूँ, जंगल जंगल फिरता हूँ,
देवदत्त हुंकार भरे तो, समय शून्य हो जाता है,
गांडीव अँगड़ाई लेता, रिपुदल-बल थर्राता है,
बहुत सहा है छल प्रपंच, अब अन्यायों से लड़ने का मन,
नहीं दैन्यता और पलायन ।

निर्णय तो जितने लेने थे, धर्मराज ने ले डाले,
मैं खड़ा रहा मर्यादावश, झूमे मदत्त गज मतवाले,
द्रुपदसुता के आँसू बन कायरता मेरी छलकी है,
हृदय धधकती लगातार, वह ज्वाला दावानल सी है,
क्षमतायें अब तक वंचित है, समझो मेरे मन का क्रंदन,
नहीं दैन्यता और पलायन ।

यह कहना क्या सही, क्या नहीं, मुझको कभी न भाया है,
मेरे हिस्से जब भी आया, निर्णय का क्षण आया है,
युद्ध नहीं होने देना, मेरी न कभी अभिलाषा थी,
और कौरवों को न कभी उकसाने वाली भाषा थी,
संभावित संहारों को मैं एकटक करता रहा मनन,
नहीं दैन्यता और पलायन ।

पीड़ा सबके घर आती है, या मैं हूँ या योगेश्वर,
सबको अपना भाग मिलेगा, जी लो उसको जी भर कर,
घुटना ना कभी मुझको भाया, व्यापकता मेरी थाती है,
मन की गहराई में जा, नीरवता सहज समाती है,
दिन सी उजली मन की स्थिति, हो कैसी भी रात बियावन,
नहीं दैन्यता और पलायन ।

मैने मन के पट नहीं कभी औरों के सम्मुख खोले हैं,
सम्बन्धों को अपनाया है और वचन यथोचित बोले हैं,
पर सदैव शतरंजी चालों को समझा, उदरस्थ किया,
और सभाओं की सम्मलित विद्वत-भाषा से त्यक्त जिया,
आज खड़ा निर्णय-क्षण, निर्मम अवसादों का पूर्ण दहन,
नहीं दैन्यता और पलायन ।
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प्रवीण पाण्डेय

21 comments:

  1. मैने मन के पट नहीं कभी औरों के सम्मुख खोले हैं,
    सम्बन्धों को अपनाया है और वचन यथोचित बोले हैं,

    गहन भावों के साथ बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  2. आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है
    http://tetalaa.blogspot.com/

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  3. पीड़ा सबके घर आती है, या मैं हूँ या योगेश्वर,
    सबको अपना भाग मिलेगा, जी लो उसको जी भर कर,
    घुटना ना कभी मुझको भाया, व्यापकता मेरी थाती है,
    मन की गहराई में जा, नीरवता सहज समाती है,
    दिन सी उजली मन की स्थिति, हो कैसी भी रात बियावन,
    नहीं दैन्यता और पलायन ।

    उत्कृष्ट लेखन ...!!
    बधाई आपको ऐसी सोच के लिए और इस रचना के लिए ..!!

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  4. आज तो यहाँ मेरी मन पसंद रचना लगी हुई है ... बहुत सुन्दर ..

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  5. मैँ जब भी यह कविता पढ़ता हूँ, अर्जुन जैसा अनुभव करने लगता हूँ। आभार आपका।

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  6. मैं खड़ा रहा मर्यादावश, झूमे मदत्त गज मतवाले,
    द्रुपदसुता के आँसू बन कायरता मेरी छलकी है,
    हृदय धधकती लगातार, वह ज्वाला दावानल सी है,

    सार्थक अभिव्यक्ति दी है अर्जुन को!!

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  7. एक एक शब्द ..दिल से निकला है ...ऐसा प्रतीत हुआ
    बहुत अच्छी लेखनी आज पढने को मिली ...बहुत खूब


    --

    anu

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  8. मैने मन के पट नहीं कभी औरों के सम्मुख खोले हैं,
    सम्बन्धों को अपनाया है और वचन यथोचित बोले हैं,
    पर सदैव शतरंजी चालों को समझा, उदरस्थ किया,
    और सभाओं की सम्मलित विद्वत-भाषा से त्यक्त जिया,
    आज खड़ा निर्णय-क्षण, निर्मम अवसादों का पूर्ण दहन,
    नहीं दैन्यता और पलायन ।bahut sunder lekhni .bahut behatrin rachanaa padane ko mili.badhaai sweekaren,

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  9. निर्णय तो जितने लेने थे, धर्मराज ने ले डाले,
    मैं खड़ा रहा मर्यादावश, झूमे मदत्त गज मतवाले,
    द्रुपदसुता के आँसू बन कायरता मेरी छलकी है,
    हृदय धधकती लगातार, वह ज्वाला दावानल सी है,
    क्षमतायें अब तक वंचित है, समझो मेरे मन का क्रंदन,
    नहीं दैन्यता और पलायन ।

    अर्जुन की मानसिक व्यथा का बहुत सटीक चित्रण...बहुत उत्कृष्ट रचना..

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  10. पर सदैव शतरंजी चालों को समझा, उदरस्थ किया,
    और सभाओं की सम्मलित विद्वत-भाषा से त्यक्त जिया!!

    धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे इसी तरह के उद्गगार चाहिए .

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  11. doosri baar parhne par bhi pahli baar jaisa hi anubhav ho raha hai Praveen.. ye aapka masterpiece hai.

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  12. सुन्दर शब्द चयन और भाव

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  13. वाह ....
    मानवीय मूल्यों और पुरुषार्थ को समर्पित सुन्दर रचना

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  14. निर्णय तो जितने लेने थे, धर्मराज ने ले डाले,
    मैं खड़ा रहा मर्यादावश, झूमे मदत्त गज मतवाले,
    द्रुपदसुता के आँसू बन कायरता मेरी छलकी है,
    हृदय धधकती लगातार, वह ज्वाला दावानल सी है,
    क्षमतायें अब तक वंचित है, समझो मेरे मन का क्रंदन,
    नहीं दैन्यता और पलायन । dwand ke bhavon ko bahut sunder shabdon me ukera hai aapne....

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  15. आपकी यह उत्कृष्ट प्रविष्टी कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी है!

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  16. प्रवीण जी आपकी कविता लेखन का कायल , बेहतरीन शब्द संजोये है आपने , मैंने आपको पहले ढंग से नहीं पढ़ा इसका मुझे खेद है , और आपसे ,आपके साहित्य से चम याचना भी एक बार पुनः अच्छी कविता के लिए बधाई

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  17. सुबोध व ग्राह्य पोस्ट .....शुक्रिया

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  18. अर्जुन को जगा दिया...प्रवीन जी...वन-वे ट्रफिक है...या चक्रव्यूह...भागने का रास्ता ही नहीं छोड़ा है...

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  19. arjun ki mansik vedna ka sunder chitran kiya hai

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  20. प्रवीणजी की यह कविता एक बेमिसाल रचना है.... हर पंक्ति भाव और अर्थ लिए .....

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  21. adbhut ! adwitiya !! Apki rchna pdne se pehle main apne tute fute shabdon ko b apni kavita smjh k khush ho leta tha..pr apne meri wo khushi chheen li,bcoz ese kehte hn rchana,sahitya..kavita ki kavitayi ar bhavon ki parakashthaa! Sadar pranaam apko!

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