तुमसे जुड़ा मैं
तुमसे सीखता रहा मायने
तुमने अलग कर खुद से
क्या सिखाना चाहा है .......



रश्मि प्रभा





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शाख ने कहा ............

एक टूटी हुई शाख ने ,
इक रोज़ कहा वृक्ष से ...
करना ही था अलग ,
क्यों जोड़ा मुझे
वृक्ष की पहचान से ?
हटाने से पहले ,
दे दी होती मुझ में भी
जड़ की सहायक सी श्वांस !
अलग होने का नहीं गम ,
बदले मैंने भी कई रंग
कभी पूजित हुआ ,
कभी तिरस्कृत
और कभी बन गया,
अंधे की लाठी समान !
कभी निर्बल का सहारा,
कभी अत्याचारी का बल
देखे मैंने भी कई रंग !
अगर देते रहते मुझे ,
यों ही जीवन - बल
मै भी छू लेता ,
आसमां की बुलंदी
लहराता - इठलाता
भोग पाता , जी लेता
अपना ये प्यारा सा जीवन !!!

[DSC00102.JPG]






निवेदिता

10 comments:

  1. और कभी बन गया,
    अंधे की लाठी समान !
    कभी निर्बल का सहारा,
    कभी अत्याचारी का बल

    इतने काम आने के बाद तो जीना सार्थक हो गया ...अच्छी प्रस्तुति ..

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  2. बहुत गहन निहितार्थ लिए सुन्दर रचना !

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  3. wah nivedita jee.........bahut khub!!

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  4. बहुत खूब! शानदार रचना!

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  5. और कभी बन गया,
    अंधे की लाठी समान !
    कभी निर्बल का सहारा,
    कभी अत्याचारी का बल
    बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ।

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  6. शाख के माध्यम से टूटने के दर्द को बहुत सही रूप में यहाँ आपने प्रस्तुत किया है ...बहुत खूब

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  7. shakh ke dard ke sahare gambher chintan

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  8. वृक्ष से टूटी शाखों का दर्द ...
    बहुत खूब !

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