ख़्वाबों के चारागाह में
धड़कनों में भी एक नदी बहती है
सागर से मिलने को बेख़ौफ़ दौडती है ...

रश्मि प्रभा



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बन्द लिफाफा

मेरे मौन की अज्ञात लिपि में
पिरो दिये हैं तुमने
कुछ भीगे अक्षर
बोलो ! मैं इनका क्या करूँ
जबकि ;मैं घर पर नहीं थी
और डाकिया डाल गया
एक बन्द लिफाफा
जिसके भीतर
एक नदी है
असंख्य आवेगों से भरी
उसकी बूँदों के वर्ण
लिख रहे हैं
कथा समंदर की
उसकी लहरें
समेटें हैं अपने आँचल में
झिलमिल चाँदनी
और चाँद की महक ,
अब तो इतना समय भी नहीं
कि वापस भेज दूँ नदी को
जहाँ से वो आई है
या कह दूँ कि
चलो चुपचाप बहती रहो
भीगने मत देना एक तिनका भी
ऐसा हो सकता है भला ?
कि नदी बहती रहे
और धरती गीली न हो !

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''लिख सकूँ तो - प्यार लिखना चाहती हूँ
ठीक आदमजात - सी बेखौफ दिखना चाहती हूँ"
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20 comments:

  1. बेहद जानदार अभिव्यक्ति

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  2. ऐसा हो सकता है भला ?
    कि नदी बहती रहे
    और धरती गीली न हो !

    वाह ... बहुत खूब ।

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  3. उम्दा भावाव्यक्ति।

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  4. एक नदी है
    असंख्य आवेगों से भरी
    उसकी बूँदों के वर्ण
    लिख रहे हैं...
    सुन्दर और भावपूर्ण पंक्तियाँ! शानदार रचना!

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  5. बेहद नाज़ुक सा एहसास .....

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  6. सवेदना से,भावों से.....परिपूर्ण रचना

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  7. बहुत मर्मस्पर्शी सशक्त अभिव्यक्ति..

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  8. एक बन्द लिफाफा
    जिसके भीतर
    एक नदी है

    वाह क्या शब्द हैं ... बहुत अच्छा लगा इतनी सुन्दर कविता पढके ...

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  9. "ऐसा हो सकता है भला ?

    की नदी बहती रहे

    और धरती गीली न हो "

    ................................भावपूर्ण , सुन्दर रचना

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  10. ek band lifafa aur nazuk ehsas..bahut khoobsurat..

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  11. बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति...

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  12. जबकि ;मैं घर पर नहीं थी
    और डाकिया डाल गया
    एक बन्द लिफाफा



    hhmm zindagi me kayi baar aisa hi hota hai

    bahut sundar prastuti

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  13. अब तो इतना समय भी नहीं
    कि वापस भेज दूँ नदी को
    जहाँ से वो आई है
    या कह दूँ कि
    चलो चुपचाप बहती रहो
    भीगने मत देना एक तिनका भी.

    बहुत संवेदनशील रचना. हर पंक्ति दिल को छूती है. बधाई हो सुशीला जी.

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  14. अन्दर तक भिगो गयी ये रचना...

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  15. नदी बहती रहे
    और धरती गीली न हो !


    ऐसा हो नहीं सकता।

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  16. विचार केन्द्रित कविता के लिए बधाई

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