दिशाओं ने पुकारा था
आत्मा ने झकझोरा था
इंसानियत ने कंधे पे आंसू बहाए थे
तुम जाने किस धुन में रहे
सुबह से जाने कितनी शाम हुई
सारे दृश्य बदल गए
हतप्रभ ! अब ये कैसी सोच ?



रश्मि प्रभा



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आज क्यूँ सोच रहे ?

आज क्यूँ सोच रहे
कि....
सूरज की रोशनी
हुई मद्धम
आज हो गई
किरणे मैली सी
हुई चांदनी भी धूमिल सी
प्रलय करने लगी
समुन्द्र की लहरे

आज क्यूँ सोच रहे
कि........
मानवता मर गई
हर आँख सुनी हो गई
रूठ चुके सपने
बिन मौसम बरस
रहा आकाश
बदल रहा हर रिश्ता
क्या है अब जीने का
ये ही अंदाज़ ?


आज क्यूँ सोच रहे हो
कि........
आज है उल्टा ज़माना
नहीं आएगा वो घर
जो सुबह का था भूला
अब खो गया है
इन तडकीली ,भड़कीली
रातो की रंगीनियों में
आज क्यूँ सोच रहे हो
कि........
टूट चुकी है सब मर्यादाएं ....||
अब क्या होगा इस सोच से ?

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अंजु चौधरी......(अनु.).......


दुनिया की इस भीड़ मे मै भी अकली सी खुद को तलाशती सी .. पर नहीं मिला कोई भी ऐसा सा जो कहें मुझे आके कोई है तू यु तन्हा ........ रिश्तो की इस भीड़ मे.. मै...मै को तलाशती सी .अंजु चौधरी......(अनु.).......

रुचि-सिर्फ लिखना........और लिखना

17 comments:

  1. यह कविता हमे सचेत करती है कि हम अब संभल जांय वरना कल यही कह कर पछताना पड़ेगा...

    टूट चुकी है सब मर्यादाएं ....||
    अब क्या होगा इस सोच से ?

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  2. सार्थक प्रस्तुतिकरण!!

    आज इसिलिये सोच रहे हैं ताकि हमारा कल सुरक्षित रहे।

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  3. "आज क्यूँ सोच रहे
    कि...."
    जब अपना किया धरा ही कुछ अजीब और अनजाना सा लगे तो ऐसा ही होता है.सारी समस्या की जड़ ही यही है करते पहले हैं सोचते बाद में है.ऐसे में सुधार की संभावनाएं क्षीण हो जाती है.बहुत सुंदर और मन को छू लेनेवाली रचना है.

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  4. धन्यवाद रश्मि जी -
    वटवृक्ष पर इसे चयन करने के लिए .....

    सुंदर अभिव्यक्ति ....दिखलाती है वो राह ....
    कि सुबह का भूला शाम को घर आ जाये .....
    झिलमिलाती रौशनी में-
    कहीं भटक न जाये ....
    और रैना संवर जाये .....!!
    अंजू जी आपको
    इस लेखन के लिए ...!!

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  5. सोच तो रहेगी जारी……… मानवीय प्रवृत्ति बन जाती है बाद मे सोचने की आवेग मे आक्रोश मे या फिर जोश मे कर बैठता है वह सब कुछ जो निहायत गैर ज़रूरी है, दानवीय है कर गुज़रने के बाद यदि मानव सोचेगा नही आज कैसे आयेगा अपनी ऊल जुलूल हरकतों से बाज सचेत हों, सतर्क हो, ……सोच तो रहेगी जारी। वैसे अंजूजी की रचना बहुत पसंद आयी……अपने मन की प्रतिक्रिया लिख बैठा……।

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  6. sochna to parega...kyonki yahi sochne wale dimag ke karan ham manavjati pure bhrahamnd me alag hain...:)

    ek sudridh rachna
    badhai anju jee:)

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  7. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (14-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  8. बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  9. aaj kyon soch rahe bahut achchha prashn hai ye itana sab gujar jane ke bad...par soch jari hai...

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  10. टूट चुकी है सब मर्यादाएं ....||
    अब क्या होगा इस सोच से ?such me aaj kyu soch rahe hai..sayad isliye ki abhi bhi waqt hai samahal le khud ko...sab kuch khtm ho jane se pahle...

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  11. इस प्रश्न का जवाब तो यही हो सकता है कि हम इस शरीर को मार सकते हैं पर इसके सोच को नहीं... सोच एक निरंतर प्रक्रिया है जिसका ख़त्म होना इंसान के अस्तित्व और आत्मा का ख़त्म होना है..
    इसलिए सोच तो चलती ही रहेगी.. हम यह चाहें या ना चाहें...

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  12. sundar vichar, bhavpurn abhivyakti.

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  13. सही बात है ... बाद में पछताने के कोई मे नहीं होते हैं ...

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  14. wahhhh kya bat hai..bahut badhiya...

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