उदासी कैसी ?
ख्यालों की किरचें जीने का सबब बनती हैं
जितना गहरा घाव होता है उतनी ही शिद्दत से सुबह होती है ....



रश्मि प्रभा




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गज़ल

हर लम्हा टूटती हुई मुफलिस की आस हो.

क्या सानेहा हुआ है कि इतने उदास हो.


सच-सच कहो कि ख्वाब में डर तो नहीं गए

आंखें बुझी-बुझी सी हैं कुछ बदहवास हो.


सीने में ख्वाहिशों का समंदर है मौजज़न

तुम फिर भी रेगजारे-तमन्ना की प्यास हो.


बाहर चलो के लज्ज़तें बिखरी हैं चार-सू

मौसम तो खुशगवार है तुम क्यों उदास हो.


वो दिन गए कि तुमसे मुनव्वर थे मैक़दे

अब तुम सियाह वक़्त का खाली गिलास हो.


जिस पैरहन में आबरू रक्खी थी चाक है

यानी हिसारे-वक़्त में तुम बेलिबास हो.


गौतम ग़मों की धूप से कोई गिला न कर

शायद ख़ुशी के बाब का ये इक्तेबास हो.

My Photo----देवेंद्र गौतम

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सम्प्रति-सम्पादकीय प्रभारी,7 डेज वीकली, रांची

1977-78 के दौरान ग़ज़लें कहनी शुरू की. हिंदी-उर्दू की पत्र-पत्रिकाओं में कई ग़ज़लें छपीं.1984

-85 के दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में उतरा. कई दैनिक, साप्ताहिक और पाक्षिक पत्रों के

सम्पादकीय विभाग में रहा. इस चक्कर में शेरो-शायरी की दुनिया से कुछ कट सा गया. ग़ज़लें

होती थीं तो डायरी में पड़ी रहती थीं.1910 में ब्लॉग और फेसबुक

डायरी से ग़ज़लें बाहर निकलने लगीं. अब तक 150 से ज्यादा ग़ज़लें हो चुकीं है. लेकिन कोई

संकलन प्रकाशित नहीं.

13 comments:

  1. हर लम्हा टूटती हुई मुफलिस की आस हो.
    क्या सानेहा हुआ है कि इतने उदास हो ।


    बहुत खूब कहा है ...इस बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

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  2. बहुत सुंदर गजल ।

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  3. आत्मविश्वास भरती शानदार गज़ल!!

    प्रस्तुति का आभार!!

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  4. bahtareen ghazal....

    badhai sweekaren.

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  5. ख्यालों की किरचें जीने का सबब बनती हैं
    जितना गहरा घाव होता है उतनी ही शिद्दत से सुबह होती है ....

    रश्मि जी -आपकी पंक्तियाँ भी सुकून दे रही हैं ......
    बहुत सुंदर शब्द .

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  6. गौतम ! आपकी ज़बांदानी के हम हुए कायल
    आप बुलंद हो इतने कि हमारे आस पास हो

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  7. गौतम ग़मों की धूप से कोई गिला न कर

    शायद ख़ुशी के बाब का ये इक्तेबास हो.

    bahut khoobasoorat aur lafz iqtebas ka umda istemal

    rashmi ji ap ke to ham pahale hi qayal hain

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  8. इक अजब सा सुकून मिल रहा है इसे महसूस करने में ..इतना गहरा समझता है कोई कहाँ ...

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