गात गात पात पात
छलका है मधुमास
प्रीत के गुलाल संग
महका है अंग अंग
कहता नशे में मन
'बरस बीता के अब होली आई
मन में उगे हैं आम के बौर
महके है आँगन
खनके है चूड़ी
चेहरे पे प्यार की लाली है छाई
कान्हा ले ले सारे रंग
प्यार के रंग कान्हा प्यार के रंग
होली आई होली आई
रंग दे चुनर कान्हा जी भरके ...'



रश्मि प्रभा 




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अनुप्रास हुआ मन-मन्दिर, जीवन मधुमास हुआ !

अनुप्रास हुआ मन-मन्दिर ,
जीवन मधुमास हुआ !

भ्रमरों के ओठों पे वासंती गीत ,
मनमीत हुए सरसों में -
मादक एहसास हुआ .......!
अनुप्रास हुआ ...!!

प्रीति की ये डोर बांधे , पोर-पोर साँसों को ,
सुबह में शीत जैसे चुम्बन ले घासों को ,
आम्र की लताओं पे बैठी-बैठी कोयलिया -
गीत बांचे गोविन्दम , ओढ़ के कुहासों को ।

नगमों की वारिश में भीगा है बदन -
मन हुआ कबीर तन औचक बिंदास हुआ .....!
अनुप्रास हुआ ......!!

झूम करके साँवरी घटा चली है रातों में ,
चूम करके चाँद को रिझा रही है बातों में,
सुरमई सी आंखों में श्याम की छवि आयी -
बावरी हुयी मीरा, खो गयी है यादों में ।
बांसों की झुरमुट से निकला है स्वर -
डर गया है सुर-पंचम कैसा उपहास हुआ ......?
अनुप्रास हुआ ...!!

झमक - झिमिर , तिपिर -तिपिर होने लगा छप्पर से ,
धमक-धिमिर , धिपिर-धिपिर बजने लगा अम्बर से ,
देहरी के भीतर से झाँक रही दुल्हनियाँ -
साजन की यादों में खोई हुई अन्दर से ।
आंखों में सपने हैं, ह्रदय में हहास-
साँसों में अनायास बृज का मधुर वास हुआ .....!
अनुप्रास हुआ ....!!
() रवीन्द्र प्रभात
   लखनऊ (ऊ. प्र.)
हिंदी के मुख्य ब्लॉग विश्लेषक के रूप में चर्चित रवीन्द्र प्रभात विगत ढाई दशक से निरंतर साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखनरत हैं ! इनकी  रचनाएँ भारत तथा विदेश से प्रकाशित लगभग सभी प्रमुख हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा उनकी कविताएँ लगभग डेढ़ दर्जन चर्चित काव्य संकलनों में संकलित की गई हैं।इन्होनें सभी साहित्यिक विधाओं में लेखन किया है परंतु व्यंग्य, कविता और ग़ज़ल लेखन में इनकी प्रमुख उपलब्धियाँ हैं। लखनऊ से प्रकाशित हिंदी "दैनिक जनसंदेश टाईम्स"  के ये नियमित स्तंभकार हैं, व्यंग्य पर आधारित इनका साप्ताहिक स्तंभ "चौबे जी की चौपाल " काफी लोकप्रिय है आजकल  ! इनके दो ग़ज़ल संग्रह क्रमश: "हमसफ़र" और "मत रोना रमजानी चाचा" तथा एक कविता संग्रह "स्मृति शेष" प्रकाशित है ! इन्होनें "समकालीन नेपाली साहित्य" में सक्रिय नेपाली  हस्ताक्षरों  की रचनाओं का एक संकलन भी संपादित किया है !ये अंतरजाल की वहुचर्चित ई-पत्रिका "हमारी वाणी" के सलाहकार संपादक तथा प्रमुख सांस्कृतिक संस्था "अन्तरंग" के राष्ट्रीय सचिव भी है। ये अनियतकालीन "उर्विजा","फागुनाहट" का संपादन तथा हिंदी मासिक "संवाद"  और  "साहित्यांजलि" का विशेष संपादन कर चुके हैं !ये  "ड्वाकरा" की टेली डक्यूमेंटरी फ़िल्म "नया विहान" के पटकथा लेखन से भी जुड़े रहे हैं !"ताकि बचा रहे गणतंत्र" /  " प्रेम न हाट बिकाए" दो  उपन्यास और "हिंदी ब्लॉगिंग : अभिव्यक्ति की नयी क्रान्ति" इनकी शीघ्र  प्रकाशित होने वाली पुस्तकें  है ! 

12 comments:

  1. आपकी कविता तो अच्छी लगती ही है .
    यह भी अच्छी लगी.
    http://commentsgarden.blogspot.com/2011/03/blog-post_11.html

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...

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  3. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (21-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  4. बहुत सुन्दर कविता ... जितने सुन्दर भाव उतने ही सुन्दर शब्द ...

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  5. झमक - झिमिर , तिपिर -तिपिर होने लगा छप्पर से ,
    धमक-धिमिर , धिपिर-धिपिर बजने लगा अम्बर से ,

    आह क्या संगीतमय प्रस्तुति है. रवीन्द्र जी और आपको होली की शुभकामनाएँ.

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  6. रसमय अनुप्रास.

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  7. छलका मधुमास तो अनुप्रास हुआ ही ..
    रंगभरे सौंधी सी खुशबू वाले गीत ...
    शुभकामनायें !

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  8. देहरी के भीतर से झाँक रही दुल्हनियाँ -
    साजन की यादों में खोई हुई अन्दर से ।
    आंखों में सपने हैं, ह्रदय में हहास-
    साँसों में अनायास बृज का मधुर वास हुआ ...

    कितना गहरा और मधुर एहसास लिए है ये रचना ... लाजवाब ....
    आपको और आपके पूरे परिवार को होली की मंगल कामनाएँ ...

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  9. संगीतमय प्रस्तुति है. रवीन्द्र जी और आपको होली की शुभकामनाएँ.

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  10. झमक - झिमिर , तिपिर -तिपिर होने लगा छप्पर से ,
    धमक-धिमिर , धिपिर-धिपिर बजने लगा अम्बर से ,
    अनुप्रासिक रचना, ध्वन्यात्मकता लिये हुए लालित्यमय है

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  11. बेहतरीन शब्‍द रचना ...।।

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