यादों के गाँव से चिठ्ठी आई है
याद किया है अमरुद के पेड़ ने नन्हे पैरों की चहलकदमी को
जो उसकी पतली शाखाओं पर भी मचलते थे
याद किया है गोलम्बर ने
जिसके किनारे रजनीगन्धा की खुशबू हुआ करती थी
अब उसके किनारे दरक चले हैं कहीं कोई खुशबू नहीं
याद किया है आँगन ने जहाँ रात की ठंडी चादरों पर अन्ताक्षरी का दौर चलता
याद किया हैगन्ने से भरी बैलगाड़ी ने जिससे गन्ना खींच हमारी हँसी हवाओं में लहराती
याद किया हैस्कूल के पायों ने जो छुप्पा छुप्पी का आधार बनते थे
याद किया है हर यादों ने जहाँ हम बच्चे थे और हमारी आँखों मेंख्वाब ही ख्वाब थे ..........
इन यादों की चिठ्ठियों का क्या जवाब दूँ?





रश्मि प्रभा




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दबंग यादें
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मुई यादें हमेशा
पीठ पीछे करती हैं वार....
कई-कई तीर बिंध जाते हैं
छाती में और
उसके अन्दर का यन्त्र
कुछ पल के लिए
टीस के मारे
अपना काम भूल जाता है...
अतीत के चाक पर
समय बेतरतीब नाचने लगता है
घटनाएँ दर्शक बन
अगली पंक्ति में बैठने को
करने लगती हैं मारामारी
कुछ दबंग यादें
अपना रौब दिखाकर
चाक के बीचो-बीच
बैठ जाती हैं
जहाँ से कोई भी
माई का लाल उठा न पाए...
उसकी खुशामद में
दासानुदास बन जाते हैं
सोच के यन्त्र
अब चढावा चढ़ाओ
सारी सोच का
तब तक चढाते रहो
जब तक वे खुश न हों ...
आत्म शोषण का
एक रोमांचक खेल
भावनाएं एक अति से
दूसरे अति पर कूदती हुई
हम निरीह होकर
सिर्फ देखते रहते हैं....
दबंग यादें -इतनी बाहुबली कि
अतीत को भी
वर्तमान बनाने का
दम- ख़म रखती हैं....
और हम
उसी यंत्रणा-काल जनित
सुख-दुःख के भंवर में
उलझते चले जाते हैं .
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() मैं.... अमृता तन्मय ...पटना से ...शब्द मेरी जो पहचान बना दे .... या शब्द ही पहचानी जाने लगे ....ख़ुशी होगी .

19 comments:

  1. सच मे यादों पर किसी का बस नही चलता। सुन्दर रचना के लिये अमृता जी को बधाई।

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  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (21-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  3. अमरुद के पेड़ पर चढ़ जाना , गन्ने की बैलगाड़ी से गन्ने चुराना ..आपकी यादों में हमारी भी ऐसी ही कितनी यादें शामिल हैं ..

    और इनकी दबंग यादें कैसे कुंडली मारे बैठी हैं!

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  4. yade hoti hi hai jo hamesa yaad aati hai
    behtareen rachna
    ..

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  5. yeh bachpan ki dabangai bahut yaad aati hai-----
    jai baba banaras-----

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  6. यादों की दबंगई से निकलना शायद किसी के बस में नहीं है लाजवाब प्रस्तुति.

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  7. bahut sundar dabang prastuti... sach mein laajawab.. aapka aabhar

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  8. दोनों ही बेहतरीन!

    याद किया है अमरुद के पेड़ ने
    नन्हे पैरों की चहलकदमी को
    जो उसकी पतली शाखाओं पर भी मचलते थे!

    उफ़ ! क्या कहें, आपकी कलम को मेरा सलाम!

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  9. दोनों ही प्रस्तुतियाँ बेहतरीन...यादों का सफर कहाँ खतम होता है..बहुत सुन्दर

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  10. दोनों रचनायें लाजवाब ...यादें सच ही दबंग होती हैं बरबस आती हैं ...

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  11. आप तो अच्छी लिखती ही हो दीदी ... इस बार अमृता जी की सुन्दर कविता भी पढ़ पाया ... बहुत अच्छा लगा ...
    दोनों रचनाएँ बेहतरीन हैं !

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  12. aap to achchha likhati hi hain ..yah nirvivad satya hai ..meri rachana ko sthan dekar ..mujhe bhi sambal diya hai .. aapka hardik aabhar.

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  13. यादें सचमुच बाहुबली सा व्यवहार करती हैं।

    कविता में भावप्रवणता शिखर पर है।

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  14. सुन्दर भाव और प्रस्तुति लाजबाब |
    आशा

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  15. इन यादों की चिठ्ठियों का क्या जवाब दूँ? ...

    यह पंक्ति बहुत कुछ कहती हुई ...इस बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

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  16. यादें ही ऊर्जा देती हैं तन-मन को। यादों की गुल्लक जब भर जाती है तो उसमें से निकलते रहते हैं भावनाओं के अनमोल मोती, जो चमक से भर देते है हमारी ज़िंदगी में चमक ही चमक। सुंदर और भवभीनी रचनाओं के लिए बहुत-बहुत बधाई।

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