अगर तुम चाहो
तो परिवर्तन संभव है...
पर तुम इस चाह से परे
दूसरों की प्रतीक्षा करते हो !
असंभव को संभव का आयाम तो दो
पानी की धारा को बदलने का सामर्थ्य
तुम्हारे ही भीतर है !

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रश्मि प्रभा





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अपराध बोध
...............

मैंने कब कहा
मैं औरों से अलग हूं,
मैंने कब कहा
मैं दुनिया से विलग हूं?
मैं मानता हूं
मैं भी उन्हीं के बीच से हूं
उसी समाज का अंग हूं,
जहां बहुओं को
दहेज के लिए जलाया जाता है।
जहां कन्याओं को
गर्भ में ही दफनाया जाता है,
जहां औरों के हक लूटकर
खुद का घर भरा जाता है।
जहां अपनों को ठगने का चलन
अपनाया जाता है,
और असल तो
ज्यों का त्यों
सूद के नाम पर
गरीबों के लहू से निचौड़ा जाता है।
......................
मैं भी उन्हीं के बीच
उन्हीं के समाज में रहता हूं
जहां बेटी से भी
कम उम्र की लड़की को
बुरी नजरों से देखा जाता है।
जहां सच को छुपाकर
झूठ और छद्म से
औरों की भावनाओं को छला जाता है।
मैं उस समाज
उस देश की परधि से
अलग कैसे हो सकता हूं?
.....
हां वेदना दुख
और कई बार
अन्तस में बहुत रोष होता तो है
लेकिन मैं
अपनी हद से आगे बढ़कर
कुछ कर नहीं पाता
कुछ बदल नहीं सकता।
जानता हूं, देखता हूं
लेकिन कुछ कर नहीं पाता
जिन हाथों में गरीब, मजलूमों
बेटियों, महिलाओं
और समाज की सुरक्षा का जिम्मा है
उन्हीं हाथों को
लहू से लिपटा पाता हूं।
अब तो आये दिन
आम होतीं ऐसी वीभत्स खबरें
किसी को भी विचलित नही करतीं।
नगरों-महानगरों में
किसी की अस्मत
किसी की गरीबी
किसी की जिन्दगी,
किसी की भावनाओं से खिलवाड़
बंद कमरों में
खबर बनकर उभरती हैं,
जो मीडिया से लेकर
नीति नियंताओं के लिए
मात्र औपचारिकता भर
प्रचार का माध्यम बन
रह जाती है।
मैं भी उसी खबर में
उसी भीड़ में
जब खुद को शामिल पाता हूं
तो अन्दर तक
अपराध बोध से घिर जाता हूं।।
दिनेश ध्यानी

19 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना...समाज पर करारा व्यंग...
    रश्मि जी आप ये अच्छी अच्छी रचनाएँ खोज कर वटवृक्ष के द्वारा पाठकों तक पहचानती है... ज्यू चिड़िया अपने मुह में तिनका दान चुग कर अपने बच्चों के पास लाती है...
    आपका आभार ..हम तक बदिया से बदिया रचना पहुचने की आपकी कोशिश के लिए नतमस्तक ...

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  2. असंभव को संभव का आयाम तो दो
    पानी की धारा को बदलने का सामर्थ्य
    तुम्हारे ही भीतर है !

    बहुत ही सुन्‍दर भावमय प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

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  3. आज के हालात का सटीक चित्रण्……………बेहद मार्मिक और सार्थक अभिव्यक्ति…………शायद हम सभी इसी अपराधबोध से ग्रसित हैं।

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  4. असंभव को संभव का आयाम तो दो
    पानी की धारा को बदलने का सामर्थ्य
    तुम्हारे ही भीतर है !


    बहुत ही उत्साहवर्द्धक पंक्तियाँ
    संजोकर रखने योग्य............

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  5. jo aaj kal ho rha hai
    use bkhubi kaha hai aapne
    sunder rachna
    ..

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  6. अज के आदमी की बेबसी, कशमकश को दिनेश जी ने बहुत भावमय शब्दों मे व्यक्त किया है। उस पर आपकी ये पँक्तियाँ----- असंभव को संभव का आयाम तो दो
    पानी की धारा को बदलने का सामर्थ्य
    तुम्हारे ही भीतर है ! बहुत प्रेरनादायी हैं। धन्यवाद रश्मि जी ।

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  7. पूरा समाज अवनति कर रहा है ... ऐसे में किसीको अपराधबोध होना ही अपने आप में एक करिश्मा है ...
    बहुत सुन्दर रचना !

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  8. हां वेदना दुख
    और कई बार
    अन्तस में बहुत रोष होता तो है
    लेकिन मैं
    अपनी हद से आगे बढ़कर
    कुछ कर नहीं पाता
    कुछ बदल नहीं सकता।

    गहरी वेदना से लिखी कविता -
    आप लिखें और उसे पढ़ कर भी अगर किसी के विचारों में परिवर्तन आ सके वो भी बड़ी बात है .
    शुभकामनाएं

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  9. पानी की धारा को बदलने का सामर्थ्य
    तुम्हारे ही भीतर है !
    bahut prerna denewali linen likhi hain....

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  10. समाधान के लिए कुछ किया होता तो फिर उनके बीच में होने का फ़ायदा ध्यानी जी को ज़रूर मिलता । महज़ क्षोभ और रोष से लाभ कुछ नहीं ।

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  11. मैं भी उसी खबर में
    उसी भीड़ में
    जब खुद को शामिल पाता हूं
    तो अन्दर तक
    अपराध बोध से घिर जाता हूं।।
    ekdam theek likhe hain...

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  12. दिनेश जी की यह रचना आम आदमी की बेबसी की कहानी कह रही है ...सच ही यह सब देख और सुन कर अपराध बोध स लगता है ...भावनात्मक अभिव्यक्ति

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  13. बहुत ही सुंदर और सच्ची कविताएं हैं दोनों
    हर पंक्ति अपराध बोध के कारणों को उजागर करती हुई ,
    सच है ऐसे हालात होते हैं कभी कभी कि इंसान केवल घुट कर रह जाता है कुछ उस के वश में नहीं होता ,ऐसे समय में केवल रोष और क्षोभ के ही भाव उमड़ते हैं ,कुछ भी कर पाने की स्थिति नहीं होती ,
    रश्मि जी और ध्यानी जि को बहुत बहुत बधाई

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  14. आज के हालात का सटीक चित्रण्……………बेहद मार्मिक और सार्थक अभिव्यक्ति…………शायद हम सभी इसी अपराधबोध से ग्रसित हैं।

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  15. behad sundarta se aapne aam aadmi ke man ki bhavnao ko ukera he!

    kavita apna asar chhodne me kamyaab hui he,

    jagriti sandesh failati hui aapki is kavita ko mera naman, aur aapko teh dil se mubarakbaad.

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  16. सच्चे ईमानदार आम व्यक्ति की छटपटाहट और बेचैनी को शब्दों ने उजागर कर दिया है !

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  17. मेरे ख्याल से अगर अपराध बोध हो रहा है तो इसपर कार्य करना ज्यादा ज़रूरी है...
    लेखन हर चीज़ को नहीं बदल सकती.. अब कार्य करना ज़रूरी है... सोचना नहीं..

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