आपने बनाया होगा बहुत कुछ अपने किचेन में
पर बैचलर पोहा ....
बनाया तो होगा बहुतों ने
पर यह नाम जुबां पे आया न होगा
तो चलते हैं किचेन में
लेते हैं सामग्री
बनाते हैं बैचलर पोहा
और मनाते हैं पिकनिक ---------- बिंदास !
रश्मि प्रभा


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बैचलर पोहा!!!

भाईयों और सहेलियों,
ज़िंदगी की किचेन में मुहब्बत का पकवान फ़िर तैयार है! जी हां, आज हम आपको सिखायेंगे बैचलर पोहा!


इनग्रीडिएंट्स
ब्राऊन ब्रैड (5-6 स्लाईस)
प्याज़ (दो बारीक कटे हुए)
टमाटर (एक चोप्ड)
शिमला मिर्च (दो बारीक कटी हुई)
दही (पांच रुपये की)
करी पत्ता (कुछ नए पत्ते)
उड़द-चने की दाल (थोड़ी सी)
नमक (स्वादानुसार, कम ही रखें,अच्छा है)
देसी घी (एक रमचा/ चमचा)
लाल मिर्च, पिसा हुआ धनिया, हल्दी, गरम मसाला (सभी अंदाज़े से)
सौस, नमकीन और चीनी


बैचलर विधि

बैचलर पोहा बनाने के लिए आपको चाहिए सन्डे की एक उबाऊ दोपहर, मोबाईल पर हेडफोन की मदद से बजते गाने और पेट की आग! अपने शरीर को गुप्ताजी के सन्डे वाले स्पेशल छोले-भठूरे और लस्सी से जनित नींद की खुमारी से आज़ाद कर किचेन का रुख करें! कमरे से निकलने से पहले बुनियादी कपडे पहनना ना भूलें, कहीं आपको किसी की बुरी नज़र ना लगे!
सबसे पहले अपनी पहली सच्ची मुहब्बत को याद करते हुए प्याज़ को बारीक-बारीक काटें. साथ में अगर राहत फ़तेह अली खान साब का 'मैं जहाँ भी रहूँ, तेरी याद साथ है...' कानों में बज रहा हो तो विरह की पूरी फीलिंग आप एन्जॉय कर सकते हैं! आपके आंसूओं से आपके इश्क की मैय्यत को भी तस्सली मिलेगी और प्याज़ का भी मान रह जाएगा! अब अपने बॉस को याद करते हुए ब्राऊन ब्रैड के छोटे-छोटे टुकड़े कर लें! लेकिन याद रहे इन्हें कुत्तों को नहीं खिलाना है, खुद खाना है! ये गाना आपके फोन में नहीं होगा, मन ही मन दोहरायें: 'एक रावण को राम ने मारा, एक रावण को मैं मारूंगा! तेरी लंका आज उजाडूंगा, जय जय श्री राम पुकारूँगा!' आप हल्का फील करेंगे! अब टमाटर और शिमला मिर्च को भी बारीक काट लें! ऐसा करते समय कोई भी गाना काम कर जाएगा, ध्यान रहे के टमाटर गला हुआ ना हो और कैप्सिकम (शिमला मिर्च की संस्कृत) में कीड़ा ना हो!

अब कढ़ाई में थोडा सा देसी घी डाल कर गैस जला दें. घी पिघलने पर इसमें प्याज़ रुपी श्रद्धा-सुमन अर्पित करें. अब इसे अकेला छोड़ कर कूलर में वाटर-लेवल चेक कर आयें. वापिस आने पर शिमला मिर्च भी कढ़ाई में डाल दें. अब जब तक 'तड़प-तड़प के इस दिल से आह निकले', तब तक मंदी आंच पे प्याज़ और कैप्सिकम को घी की सरपरस्ती में इश्क फरमाने दीजिये. प्याज़ के भूरा और कैप्सिकम के अधकचरा (कृपया इसे कूड़े वाले कचरे से ना जोड़ें) होने पर उड़द-चने की दाल डाल दें. दोनों दालों के सुनहरा और करारा होने तक भूनें और फ़िर टमाटर की आहूति दें. ठीक इसी समय इस मिश्रण में करी-पत्ता डाल दें. सही स्वाद और सुगंध के लिए ज़रूरी है के करी-पत्ता माँगा हुआ ना हो. पर आपके बैचलर घोंसले में तो इसका पौधा है ही नहीं! घबराईये नहीं, इसका उपाय भी है हमारे पास. जब सामने वाली खिड़की में कौशल जी की बेटी रूपिका खड़ी हो, ठीक उसी समय उनकी क्यारी में लगे हुए पेड़ से बिना पूछे पूरी टहनी तोड़ लें. पूछना आपकी बैचलर इमेज के अगेंस्ट है! अब इस टहनी को रुपिका की तरफ ऐसे उठाएं मानो सचिन ने एक और शतक ठोक दिया हो! आगे क्या करना है ये रुपिका के रीऐक्शन पर निर्भर करता है!

इसके बाद कढाई में स्वादानुसार (कम हो तो सेहत के लिए बेहतर) नमक,लाल मिर्च, पिसा हुआ धनिया, हल्दी, गरम मसाला आदि डाल दें. अगर एमडीएच का छोले मसाला बचा हुआ है, तो वो भी आप इसमें डाल सकते हैं. अब वक़्त आ गया है दोस्तों के ब्रैड के रूखे-सूखे जीवन में प्रेम की तरलता का आगमन हो. लेकिन ये क्या? आप दही लाना तो भूल ही गए! कोई बात नहीं, टेंशन नहीं लेने का. पास ही के मायाराम हलवाई से पांच रुपये का दही ले आयें. दही को ब्रैड में आधा-अधूरा मिक्स कर दें. अब दही और ब्रैड के अमर-प्रेम को आज़माने के लिए उसे अग्नि-परीक्षा की आंच पर चढ़ा दीजिये! मेरा मतलब, कढ़ाई में!

इस मिली-जुली सरकार को मंदी आंच पर थोड़ी देर तक सिकने दें और फ़िर प्लेट में परोसें. गार्निशिंग के लिए थोड़ी सी सौस, काफी सारी नमकीन (शाही मिक्सचर हो तो क्या बात है!) और ऊँट के मूंह में ज़ीरा के बराबर चीनी प्लेट में चारों तरफ बिखरा दें. बैचलर पोहा तैयार है. सन्डे की एकमात्र अच्छी बात, एचटी मैट्रीमोनियल्स के ऊपर रख कर खाएं. प्लेट को हिला-हिला कर आप अपनी जानकारी में इज़ाफा भी कर सकते हैं! और हां, नुसरत साब को गाने दीजिये: 'मस्त नज़रों से अल्ला, अल्ला बचाए..... हर बला सर पे आ जाए लेकिन, हुस्न वालों से अल्ला बचाए'!!!!!


चलते-चलते डायरी के भीगे पन्नों से कल की बातें:

आज के रंगीं महकते लम्हें
कल तेरा माज़ी बन जायेंगे,
पलट के देखोगी जब इनको तो
हम भी कहीं नज़र आयेंगे!


खुशियाँ बांटते प्यार लुटाते
हम तो हमेशा शाद रहेंगे,
दीद हुई जो आब तुम्हारी
अश्कों में भी मुस्कायेंगे!


कल तेरे आज को रोशन करना
हो तो बेहिचक बताना,
अपना क्या है हम मनमौजी
मुस्तकबिल में चले आयेंगे!


सूरत क्या है एक लम्हा है
कितना रोको बदल जायेगी,
सीरत पर हम आज मरें हैं
सीरत पर कल मिट जायेंगे!


शायर हूँ तुम सबका हिस्सा
मैं बन जाऊं ये लाज़िम है!
मेरा हिस्सा कोई बन जाए
ऐसे दिन कब आयेंगे?
हा हा हा.....


आशीष
http://myexperimentswithloveandlife.blogspot.com/

17 comments:

  1. आज के रंगीं महकते लम्हें
    कल तेरा माज़ी बन जायेंगे,

    बहुत ही सुन्‍दर सी बात है इन पंक्तियों में और प्रस्‍तुति में भी .......।

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  2. अशीश जी की य रचना जितनी बार भी पढी जाये आनन्द देती है।
    मेरा हिस्सा कोई बन जाए
    ऐसे दिन कब आयेंगे?
    अरे बेटा हम तो कब से इसी बात का इन्तजार कर रहे हैं। ताकि असली पोहा उसी के हाथ से खा सकें। बधाई आशीर्वाद। रश्मि जी आपका भी धन्यवाद।

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  3. मजेदार पोहा .... जितनी बार भी पढ़ा जाये स्वाद बढ़ जाता है :):)

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  4. रश्मि माँ, हृदय से नमस्कार!
    तो कर ही दिया आपने इस कुंवारे की व्यथा का प्रचार!
    हमारी ज़िंदगी तो है बस मुहब्बत की तलबगार!
    बतौर सबूत पेश है ग़ालिब अंकल को जवाब देता एक अशार:

    चचा कह गए हैं:
    ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजे,
    एक आग का दरिया है और डूब के जाना है.

    माई रिप्लाई:
    हम तो डूबे रहना चाहते हैं इस आग के दरिया में,
    किसको कश्ती की दरकार किसको पार जाना है!?

    सभी को एक ही सन्देश: ज़िंदगी को सीरियसली नहीं, सिंसीअर्ली लीजिये. खुश रहिये.
    आपका भी,
    आशीष

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  5. बनाने आऊं कि
    आऊं खाने
    आता नहीं मुझे
    बनाना पोहा
    पर मैं खाता हूं
    खुश होकर पोहा।

    हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के एक सेमिनार में शामिल ब्‍लॉगरों के हथियारों की झलक

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  6. kash aisa bechlor poha hamne bhi khaya hota aur
    सन्डे की एकमात्र अच्छी बात, एचटी मैट्रीमोनियल्स के ऊपर रख कर खाएं.
    matrimonials pe bhi najar daal late...:P

    dil jeet liya aapne

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  7. बहुत बढ़िया पोहा ,और कविता भी :)

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  8. .

    रश्मि जी ,
    पोहा अक्सर बनाती हूँ मगर इतना स्वादिष्ट कभी नहीं बना । रेसिपी बताने के लिए आभार । अगले सन्डे की खुशनुमा शाम इसी बेचलर पोहे के नाम ।

    आशीष जी को इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई।

    .

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  9. पोहा ज़रूर स्वादिष्ट होगा ... जब उसको वर्णन करने का तरीका इतना सुन्दर है ...
    खैर बहुत दिन हो गए पोहा नहीं खाया ... यहाँ उसके सामग्री नहीं मिलते हैं ...
    कविता बहुत सुन्दर है ...

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  10. DELICIOUS POHA....
    AUR EK SUNDER KAVITAA /

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  11. aapke batae tareeke se poha zaroor banaenge...aur is lajabab kavita ko padh-padhkar khaenge.

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  12. अरे वाह!
    बहुत बढ़िया भोजन परोसा है!

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  13. शायर हूँ तुम सबका हिस्सा
    मैं बन जाऊं ये लाज़िम है!
    मेरा हिस्सा कोई बन जाए
    ऐसे दिन कब आयेंगे?
    हा हा हा.....

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  14. bahut bahut bahut khoob!! apne jo vidhi bataayi usko bataane ka andaaz apne bachelor poha se zyada masaaledaar tha :)

    Shukriya Rashmi di aur Ashish ji ise share karne keliye.

    --Gaurav

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  15. शानदार लज़ीज़ बेचलर पोहा ..
    कविता भी जायकेदार है !

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