जिस्म का रिश्ता
रूह तक नहीं जाता
पर रूह का रिश्ता
जिस्म तक जाता है
जिस्म के सज़दे में होता है ....

रश्मि प्रभा




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यह आग की बात है ,तूने यह बात सुनाई ही
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अमृता जी के बारे में जितना लिखा जाए मेरे ख्याल से उतना कम है , जैसा कि मैंने अपने पहले लेख में लिखा था कि मैंने इनके लिखे को जितनी बार पढ़ा है उतनी बार ही उसको नए अंदाज़ और नए तेवर में पाया है .।उनके बारे में जहाँ भी लिखा गया मैंने वह तलाश करके पढ़ा है ।एक बार किसी ने इमरोज़ से पूछा कि आप जानते थे कि अमृता जी साहिर से दिली लगाव रखती हैं और फ़िर साजिद पर भी स्नेह रखती है आपको यह कैसा लगता है ?
इस पर इमरोज़ जोर से हँसे और बोले कि एक बार अमृता ने मुझसे कहा था कि अगर वह साहिर को पा लेतीं तो मैं उसको नही मिलता .तो मैंने उसको जवाब दिया था कि तुम तो मुझे जरुर मिलती चाहे मुझे तुम्हे साहिर के घर से निकाल के लाना पड़ता "" जब हम किसी को प्यार करते हैं तो रास्ते कि मुश्किल को नही गिनते मुझे मालूम था कि अमृता साहिर को कितना चाहती थी लेकिन मुझे यह भी बखूबी मालूम था कि मैं अमृता को कितना चाहता था !"

साहिर के साथ अमृता का रिश्ता मिथ्या व मायावी था जबकि मेरे साथ उसका रिश्ता सच्चा और हकीकी.वह अमृता को बेचैन छोड़ गया और मेरे साथ संतुष्ट रही .।

उन्होंने एक किस्से का बयान किया है कि जब गुरुदत्त ने मुझे नौकरी के लिए मुम्बई बुलाया तो मैं अमृता को बताने आया ।अमृता कुछ देर तक तो खामोश रही फ़िर उसने मुझे एक कहानी सुनाई .यह कहानी दो दोस्तों की थी इसमें से एक बहुत खूबसूरत था दूसरा कुछ ख़ास नही था ।.एक बहुत खूबसूरत लड़की खूबसूरत दोस्त की तरफ़ आकर्षित हो जाती है वह लड़का अपने दोस्त की मदद से उस लड़की का दिल जीतने की कोशिश करता है ,उस लड़के का दोस्त भी उस लड़की को बहुत प्यार करता है पर अपनी सूरत कि वजह से कभी उसक कुछ कह नही पाता है आखिरकार उस खूबसूरत लड़की और उस खूबसूरत लड़के की शादी हो जाती है इतने में ज़ंग छिड जाती है और दोनों दोस्त लड़ाई के मैदान में भेज दिए जातें हैं।

लड़की का पति उसको नियमित रूप से ख़त लिखता है लेकिन वह सारे ख़त अपने दोस्त से लिखवाता है कुछ दिन बाद लड़ाई के मैदान में उसकी मौत हो जाती है और उसके दोस्त को ज़ख्मी हालत में वापस लाया जाता है लड़की अपने पति के दोस्त से मिलने जाती है और अपने पति के ख़त उसको दिखाती है दोनों खतों को पढने लगते हैं तभी बिजली चली जाती है पर उसके पति का दोस्त उन खतों को अंधेरे में भी पढता रहता है क्यूंकि वो लिखे तो उसी ने थे और उसको जबानी याद थे ।लड़की सब समझ जाती है ,पर उस दोस्त कीतबीयत भी बिगड़ जाती है और वह भी दम तोड़ देता है ।लड़की कहती है की मैंने एक आदमी से प्यार किया लेकिन उसको दो बार खो दिया !

एक गहरी साँस ले कर इमरोज़ ने यही कहा कि अमृता ने सोचा था कि मुझे कहानी का मर्म समझ मैं नही आया पर मैं समझ गया था कि वह कहना चाहती थी कि पहले साहिर मुझे छोड़ के चला गया अब तुम मुझे छोड़ के जा रहे हो और जो चले जाते हैं वह आसानी से वापस कहाँ आते हैं .।जब इमरोज़ मुम्बई पहुंचे तो तीसरे दिन ही अमृता को ख़त लिख दिया कि मैं वापस आ रहा हूँ उन्होंने कहा कि मैं जानता था कि अगर मैं वापस नही लौटा तो हमेशा के लिए अमृता को खो दूंगा।
इमरोज़ ने बताया कि अमृता ने कभी भी अपने प्यार का खुले शब्दों में इजहार नही किया और न मैंने उसको कभी कहा अमृता जी ने अपनी एक कविता में लिखा था कि .

आज पवन मेरे शहर की बह रही
दिल की हर चिनगारी सुलगा रही है
तेरा शहर शायद छू के आई है
होंठो के हर साँस पर बेचैनी छाई है
मोहब्बत जिस राह से गुजर कर आई है
उसी राह से शायद यह भी आई है

इमरोज़ जी अपने घर की छत पर खड़े उस गाड़ी का इंतज़ार करते रहते थे जिस में अमृता रेडियो स्टेशन से लौटती थीं .गाड़ी के गुजर जाने के बाद भी वह वहीं खड़े रहते और अवाक शून्य में देखते रहते वे यहाँ इंतज़ार करते और वह वहाँ कविता में कुछ लिखती रहती

जिंद तो हमारी
कोयल सुनाती
जबान पर हमारे
वर्जित छाला
और दर्दों का रिश्ता हमारा


अमृता जी की लिखी एक रचना

यह आग की बात है
तूने यह बात सुनाई है
यह ज़िंदगी की वोही सिगरेट है
जो तूने कभी सुलगाई थी

चिंगारी तूने दे थी
यह दिल सदा जलता रहा
वक़्त कलम पकड़ कर
कोई हिसाब लिखता रहा

चौदह मिनिट हुए हैं
इसका ख़ाता देखो
चौदह साल ही हैं
इस कलम से पूछो

मेरे इस जिस्म में
तेरा साँस चलता रहा
धरती गवाही देगी
धुआं निकलता रहा

उमर की सिगरेट जल गयी
मेरे इश्के की महक
कुछ तेरी सान्सों में
कुछ हवा में मिल गयी,

देखो यह आखरी टुकड़ा है
ऊँगलीयों में से छोड़ दो
कही मेरे इश्कुए की आँच
तुम्हारी ऊँगली ना छू ले

ज़िंदगी का अब गम नही
इस आग को संभाल ले
तेरे हाथ की खेर मांगती हूँ
अब और सिगरेट जला ले !!



रंजना भाटिया

20 comments:

  1. रंजना जी
    अमृता जी को पढवाने के लिये आपकी शुक्रगुज़ार हूँ जब भी पढो एक नया अहसास होता है।

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  2. दीदी,
    रंजना जी के माध्यम सेअमृता जी की रचना से रूबरू कराने केलिये ह्रदय से आभारी हूँ.जिनकी प्रतीक्षा इमरोज जी जैसे लोग करते रहे हों,वैसी हस्ती को मेरा नमन है.आज मैं पहलीबार रंजना जी के माध्यम से इमरोज जी और अमृता जी के बारे में जान पाया हूँ और प्रेम के अद्भुत परा-भौतिक संसार की झलक देख पाया हूँ जो john donne की कविताओं में देखने को मिलती थी. इसके लिए आपदोनों का आभार.

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  3. दीदी,
    रंजना जी के माध्यम सेअमृता जी की रचना से रूबरू कराने केलिये ह्रदय से आभारी हूँ.जिनकी प्रतीक्षा इमरोज जी जैसे लोग करते रहे हों,वैसी हस्ती को मेरा नमन है.आज मैं पहलीबार रंजना जी के माध्यम से इमरोज जी और अमृता जी के बारे में जान पाया हूँ और प्रेम के अद्भुत परा-भौतिक संसार की झलक देख पाया हूँ जो john donne की कविताओं में देखने को मिलती थी. इसके लिए आपदोनों का आभार.

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  4. रंजना जी ,
    आक की पेशकश बहुत खास है ...बहुत अच्छा लगा पढ़ना ..

    रश्मि जी ,
    आभार ,इस प्रस्तुति के लिए

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  5. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (13/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  6. रश्मि जी ,
    इस प्रस्तुति के लिए,आभार...

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  7. क्या कहूँ ... अद्भुत, अनुपम ...

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  8. हम तो कब से पढ़े जा रहे हैं, काव्य, गद्य और न जाने क्या क्या!
    ब्लॉग पर ऐसी बातें भी मिलती हैं पढ़ने को, मालूम न था|

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  9. अमृता जी से संबंधित प्रसंग पढ़कर अच्छा लगा। वे एक महान लेखिका और कवयित्री थीं। मैं तो उन्हें दार्शनिक समझता हूं।


    चिंगारी तूने दी थी
    यह दिल सदा जलता रहा
    वक़्त कलम पकड़ कर
    कोई हिसाब लिखता रहा

    ऐसी बातें कोई दार्शनिक ही लिख सकता है।

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  10. रश्मि-रंजना और अमृता-इमरोज की बेजोड़ प्रस्‍तुति।

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  11. रश्मि जी,
    आज की पोस्ट यादगार बन गई है.

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  12. संवेदना की
    बहुत बड़ी पहचान है
    बहती हुई अश्रुधारा!
    जीवन के उन्मुक्त गगन पर
    खग वृन्दों सा
    विचरे प्रेम सारा!
    --
    परोक्ष में तो यही पोस्ट का सार है!
    --
    उच्चारण का पता बदल गया है!
    इसलिए चिट्ठाजगत पर दिखाई नहीं देता है!

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  13. यह जिंदगी की वही सिगरेट जो तूने कभी सुलगाई थी ...
    अमृता जी को पढना हमेशा ही लाजवाब अनुभव रहता है ...
    आभार !

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  14. कुदरत के केनवास पे रचित अमृता जी एक ऎसी आकृति थी जिसे पढ़ पाना आसान नही ,
    लेकिन बिना पढ़े रह पाना भी आसान नही .

    साहिर के जाने पर उसके जले हुए सिगरेटों को
    फिर से पीना ....
    फिर इमरोज़ को कहना ...में तेनु फिर मिलेंगी ...|
    ये उनके प्रेम की ऊँचाई थी जिसमे आस्तित्व गौण
    हो जाता .

    इन सबके बीच यदि कुछ बना रहा तो वो उनकी कलम .....

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  15. ishq ke jitne bhi kisse mash-hoor hue judaai ke they. amrita-imroz ka ishq milan ka aisa sach hai jo kahani nahi, aur jisme kabhi kisi ne ishq ka izhaar shabdon mein na kiya. dono ne ishq jiya hai. imroz se milna amrita se bhi milna hota, wo aaj bhi unke sath aise hain jaise imroz kee nazm ji rahi. bahut achha laga padhna. shubhkaamnaayen.

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  16. अमृता जी, को पढ़ना ब्‍लाग जगत में ...उसका माध्‍यम या तो आप रही हैं ....या फिर रंजना जी, इस बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये आप दोनों का बहुत-बहुत आभार .........।

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  17. इस सुन्दर प्रस्तुति हेतु आभार!

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  18. बहुत ही खुबसुरत रचना.......मेरा ब्लाग"काव्य कल्पना"at http://satyamshivam95.blogspot.com/ साथ ही मेरी कविताएँ हर सोमवार और शुक्रवार "हिन्दी साहित्य मंच" पर प्रकाशित....आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे....धन्यवाद।

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  19. रश्मि जी ,
    इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए,आभार...

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