सत्य का रास्ता बहुत कठिन होता है ,
बहुत तकलीफें,
अनगिनत कठिनाईयाँ .
सरल कुछ भी नहीं होता है.
पर यूँ ही तो नहीं कहते सब
'सत्यमेव जयते'?
जीत आसानी से कभी नहीं मिलती

रश्मि प्रभा



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छाछ और दूध!

वह स्टाफ रूम में पानी के गिलास लेकर जा रही थी और उसके आँचल से टप टप करके दूध टपकने लगा. उसका कलेजा धक् से हो गया. क्या छोटा भूखा है? बड़के ने उसको दूध नहीं दिया होगा? भूल गया होगा? अरे अभी है ही कितने साल का? कुल ४ साल ही का तो है. फिर आँचल लपेट कर वह स्टाफ रूम में घुस ही गयी और टेबल पर गिलास रख कर वापस आ गयी.
अभी कुल ४ महीने का ही तो छोटा है, उसको अभी माँ का ही दूध चाहिए लेकिन किस्मत की मार ने उसके दूध को भी उससे छीन लिया. कैलाश इसी स्कूल में चपरासी था और एक दिन साईकिल से जाते समय उसको एक ट्रक ने कुचल दिया. वह उस समय १५ दिन के छोटे को गोद में लिए थी. उसका तो घर ही बिखर गया. घर में अब बचा कौन ? बूढी अंधी सास और दो छोटे

बच्चे. स्कूल वालों ने कहा कि अभी तुम्हें उसी जगह नौकरी मिल जाएगी तो तुम्हारे बच्चे पल जायेंगे नहीं तो दर दर भटकोगी और ये दुनियाँ वाले तुम्हें जीने नहीं देंगे. तभी उसने छोटे के २ महीने के होते ही नौकरी पर आना शुरू कर दिया था.


सुबह खाना बना कर रख देती और खुद रोटियां बाँध लाती. बड़ा दादी को खाने को दे देता और छोटे को दूध बोतल में भर कर पिला देता था. बस इसी तरह से जिन्दगी चलने लगी थी. महीने में इतना मिल जाता कि बच्चों का पेट भर लेती. स्कूल जरूर दूर था पैदल चल कर आती तो एक घंटा लग जाता था लेकिन दो रोटी का सहारा तो था .
उसका मन आज स्कूल में नहीं लग रहा था. पता नहीं क्यों छोटा भूखा रो रहा है? छुट्टी की घंटी बजाते ही , वह प्रिंसिपल से बोली की 'बहनजी , हमारी तबियत ठीक नहीं है, हम आज अभी घर चले जाएँ.' उसके व्यवहार और उसकी व्यथा से सब परिचित थे कि वह नन्हा सा बच्चा घर छोड़ कर आती है इस लिए कोई कुछ न कहता और उसको घर आने की अनुमति मिल गयी.
घर में कदम रखते ही बड़ा बोला - 'अम्मा आज छोटे ने दूध नहीं पिया और अम्मा खूब रोया , मैंने तो झूले में लिटा कर जोर जोर से झुलाया तो रोते रोते सो गया. छोटे के गालों पर बहे आंसू अब सूख चुके थे. वह दूध के पास गयी तो दूध का बर्तन तो उतना ही भरा था जितना वह छोड़ गयी थी फिर बड़े ने क्या पिलाया? उसने छाछ का बर्तन खोला तो उसमें कम था. आज बड़े ने अनजाने में दूध की जगह बोतल में छाछ भर कर उसको पिला रहा था तभी तो उसने पिया नहीं और भूखे छोटे की भूख उसके आँचल में ढूध के साथ बहने लगी थी. उसने छोटे को उठा कर अपना ढूध पिलाना शुरू किया तो बड़ा भी आकर वहीं खड़ा हो गया. 'अम्मा मैंने इसको दूध पिलाया था इसने पिया नहीं - अम्मा क्यों नहीं पिया इसने? ' उसने बड़े को भी खींच कर अपने गले से लगा लिया और उसकी आँखों से आंसूं बहने लगे. माँ को रोता देख कर बड़ा बोला - 'सच्ची अम्मा मैंने इसको दूध पिलाया था. तुम क्यों रो रही हो? मैं बोतल लाता हूँ.'


'नहीं मेरे लाल , मैं जानती हूँ कि तूने इसे दूध पिलाया था और इसने नहीं पिया.' पर वह इस लिए नहीं रो रही थी . वह तो अपनी किस्मत पर रो रही थी . इतना छोटा बच्चा छाछ और दूध का अंतर
क्या जाने?

रेखा श्रीवास्तव

11 comments:

  1. बहुत मार्मिक ! आंसू भर आये आँखों में !

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  2. बेहद मार्मिक चित्रण्।

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  3. बेहद मार्मिक !

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  4. बेहद मार्मिक रचना।

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  5. sab samye samye ki bat he,
    waqt jo na karvaye/ jo na shikhaye,

    sudnar rachna ke liye sadhubad..

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  6. गहरे मर्म से उपजी वेदना मुखरित करती साकार रचना ..आभार

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  7. काम काजी महिलाओं की वेदना का इतना मर्मस्पर्शी चित्रण कि आंखे नम हो गई. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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  8. मार्मिक...
    और गूढ़ अर्थ का समावेश भी.

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  9. बहुत मर्मस्पर्शी कथा कितनी ही मजबूरी के वेदना को लिए हुवे.. बेहद सुन्दर रचना.. दूर तक असर करने वाली..

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